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Friday, June 23, 2017

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ये कहाॅ आ गये हम

सत्ता हासिल करने के फेर में अपनी नीतियों व सिद्धान्तो से भटकी भाजपा।
राजनीति में सुचिता और पारदर्शिता की दुहाई देने वाली भाजपा द्वारा उत्तराखंड की चुनावी सफलता के मद्देनजर उन तमाम नेताओं व मंत्रियां को तो अंगीकार किया ही गया जिनपर वह अब तक भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते नही थकते थी साथ ही साथ इन बागी नेताओं व पार्टी हाईकमान के इस फैसले के खिलाफ बगावत की धमकी देने वाले अपने प्रदेश स्तरीय किन्तु वरीष्ठ नेताओं के दबाव में संगठन के जमीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर कुछ विशेष लोगों के परिजनों को भी चुनाव मैदान में उतारा गया। भाजपा का यह नया अंदाज उसके पुराने किन्तु जुझारू कार्यकर्ताओं को कम समझ में आ रहा है और उन्हें इस फार्मूले की सफलता पर विश्वास भी नही है लेकिन नमो-नमो के हल्ले में कार्यकर्तओं की आवाज दब सी गयी है ओर वह चुपचाप बैठकर तमाशा देखने को मजबूर है। उत्तराखंड ही नही उ.प्र. में भी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बनाये गये केशव प्रसाद मौर्य की असंयमित वाणी तथा उनपर लगे महिला उत्पीड़न समेत अन्य तमाम तरह के आरोप यह इशारा कर रहे है कि सत्ता की चाह में भाजपा को भी अपने सिद्धान्तों से समझौता करने में कोई गुरेज नही है। अगर भाजपा के इतिहास पर गौर करें तो हम पाते है कि अस्सी के दशक में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के राजनैतिक इरादों को अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य से खड़ी की गयी भारतीय जनता पार्टी को मजबूत संगठनात्मक आधार देने में शहरी क्षेत्र के छोटे व्यापारियों (बनिया समुदाय) का बड़ा हाथ रहा और अपने हिन्दूवादी ऐजेण्डे तथा आदर्शो की राजनीति के बूते दो सांसदों की उपलब्धि से अपना कार्यकाल शुरू करने वाले दिग्गज नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में इसने पहली बार सैकड़े का आकड़ा पार किया। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि तत्कालीन भाजपा के बडे़ नेताआंे के रूप में मुरली मनोहर जोशी के अलावा लालकृष्ण आडवाणी व अटल बिहारी वाजपेयी जैसे बडे नेताओं ने भाजपा को आदर्श व लक्ष्य प्रदान किये तथा सिकन्दर बख्त जैसे ओजस्वी विचारकों ने अपने समाज की धारा के विरूद्ध जाकर इस संगठन में प्राणो का संचार किया। तात्कालीन भाजपा की आदर्शवादी बातों व लक्ष्य के प्रति जुनून में कुछ तो ऐसा जरूर था जो आजीवन वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाले जाॅर्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं को भाजपा के साथ गठबंधन करने या फिर गठबंधन सरकार का हिस्सा बन मंत्रालय संभालने में कोई दिक्कत नही हुई और राममंदिर जैसे विवादित मुद्दों पर स्पष्ट रूख के बावजूद भी भाजपा के नेता व उनके नेतृत्व में बनने वाली सरकार देश की जनता को यह समझाने में कामयाब रही कि देश में कानून से सर्वाेपरि कुछ भी नही है। यह ठीक है कि अपनी नीतियों व सिद्धान्तों पर अडिग भाजपा के इन तमाम वयोवृद्ध नेताओं को राजनीति के शीर्ष पदो को हासिल करने के मामले में मनवांछित सफलता नही मिली और पीएम इन वेंटिग कहलायें जाने वाले लालकृष्ण आडवाणी को अपने राजनैतिक जीवन के अन्तिम दौर में बेमन से मार्गदर्शक मण्डल में शामिल होना पड़ा लेकिन यह तय है कि राष्ट्रीय राजनीति के परिपेक्ष्य में जब भाजपा के स्वर्णिम अतीत की बात होगी तो इन तमाम नेताओं का जिक्र व राजनीति के आदर्शो को मुद्दा जरूर बनाया जायेगा। हो सकता है कि भाजपा के नये कर्णधारी को अपने इन शीर्ष नेताओं को राजनीति की मुख्यधारा में जोड़े रखने से तमाम आपत्तियां हो या फिर उन्हें यह लगता हो कि कोरे नियम या फिर सिद्धान्तों के बलबूते सत्ता पर कब्जेदारी का खेल आसान नही है लेकिन इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि भाजपा अटल-आडवाणी के युग से मोदी और अमित शाह के युग में आने तक कांग्रेस व अन्य तमाम क्षेत्रीय दलों का सस्ता संस्करण मात्र बनकर रह गयी है और सत्ता की शीर्ष को हासिल करने के लिऐ भाजपा के नीति नियंताओं को अपनी सोच में इतने बदलाव करने पड़े है कि असली व नकली भाजपा का अन्तर स्पष्ट पहचाना जा सकता है। यह ठीक है कि भाजपा ने अपना हिन्दुत्व व हिन्दू राष्ट्र वाला मुद्दा अभी छोड़ा नही है और उसे वैचारिक धरातल पर मजबूती देने वाला राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ पूरी दृढ़ता के साथ उसके पीछे है लेकिन किसी भी कीमत पर चुनावी जीत हासिल करने की जिद ने भाजपा को इतना लचीला बना दिया है कि कोई भी जोर का झटका भाजपा में बड़ा बिखराव ला सकता है। यह स्पष्ट दिख रहा है कि स्थानीय समीकरणों को मजबूती प्रदान कर छोटे-छोटे सामाजिक मुद्दे उठाने की भाजपा की नई रणनीति ने अब तक ग्रामीण क्षेत्रों में जनाधार से महरूम रहे इस राजनैतिक दल को मतदाताओं का एक बड़े वर्ग के बीच लोकप्रियता दिलवायी और प्रचार-प्रसार के संसाधनो का समुचित उपयोग करने में भी भाजपा के नेताओ ने महारत हासिल की लेकिन अपना महिमामण्डन करते हुऐ वाहवाही लूटने की जिद में तमाम संवेधानिक फैसले लेने से पूर्व पार्टी फोरम या जनपक्षीय अदालतों में अपनी मंशा का जिक्र न करने की रणनीति ने भाजपा को मदारियों की पार्टी बनाकर रख दिया। कितना आश्चर्यजनक तथ्य है कि जिस छोटेे व्यापारी व बनिया समुदाय ने अपने तमाम छोटे-मोटे खर्चो में कटौती कर भाजपा को खड़ा होने के लिऐ आर्थिक संबल प्रदान किया, आज वही व्यापारी समुदाय भाजपा से नाराज दिख रहा है और कोई बड़ी बात नही है कि हालिया पाॅच राज्यो के विधानसभा चुनावों और आगे आने वाले लोकसभा चुनावों में भी देश के शहरी व कस्बाई क्षेत्रो में भाजपा का सूपडा साफ दिखे। कुछ लोग भाजपा की सत्ता पर काबिज मोदी व अमित शाह की जोड़ी को राष्ट्र के चर्हुमुखी विकास के लिऐ प्रतिबद्ध व भाजपा के स्वर्णिम इतिहास का रचियता बताते नही थक रहे है लेकिन ऐसे लोगो को ध्यान रखना चाहिऐं कि लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में कोई भी राजनैतिक दल या नेता अपने समकालीन अन्य विचारधाराओ या नेताओं को खत्म कर बहुत ज्यादा समय तक सत्ता में नही बना रह सकता। दशकों पहले ऐसी ही कुछ कोशिश इन्दिरा गाॅधी ने भी की थी और कुछ समय के लिऐ यह लगा भी था कि देश में उनके अलावा कोई नेता ही नही है लेकिन उनके मैदान से हटने के बाद काॅग्रेस आज तक संभल ही नही पायी। यह काॅग्रेस का 125 सालो पुराना इतिहास व आजादी के आन्दोलन में उसके बड़े नेताओ द्वारा दी गयी आहुति का ही प्रतिफल है कि काॅग्रेस बिना किसी मजबूत नेता के इतने समय बाद भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ती नजर आ रही है और तमाम क्षेत्रीय राजनैतिक दल उसे आज भी महत्वपूर्ण मान रहे है लेकिन भाजपा के पास ऐसा कुछ भी नही है। इसलिऐं इसके नेताओ ने खुद को अहम् और झूठ के खेल से बचाकर रखना होगा।

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