Saturday, March 25, 2017

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बदली हुई तस्वीर में

चरम् पर पहुॅच चुके चुनाव प्रचार के दौरान साफ दिख रहा है सर्वमान्य नेताओं का आभाव।
लगभग अन्तिम दौर की ओर प्रस्थान कर रहे उत्तराखण्ड के चुनाव प्रचार में काॅग्रेस व भाजपा के बड़े नेताओ की भूमिका तय हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तराखण्ड में चार चुनावी सभाऐं करने वाले है जबकि काॅग्रेस के बड़े नेता के रूप में राहुल गाॅधी रोड शो के माध्यम से अपना असर छोड़ने का प्रयास करेंगे। हाॅलाकि यह कहना कठिन है कि इन तमाम बड़े नामो के इन चुनावी दौरो या फिर विभिन्न माध्यमो से किये जाने वाले चुनाव प्रचार का आम मतदाता पर क्या असर पड़ता है और राजनीति के मैदान में बड़े नाम कहलाये जाने वाले कुछ चेहरे मतदान को लेकर उदासीन दिख रहे मतदाताओं के एक बड़े हिस्से पर किस तरह से प्रभाव डालते है लेकिन जैसा कि चुनावों को लेकर परम्परा रही है उन्ही परम्पराओं के निर्वहन के क्रम में चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रो में इन बड़े नेताओ की प्रतीक्षा करते है और कुछ एक खास मौको पर फिल्मी से जुड़ी बड़ी हस्तियों को भी प्रचार के नाम पर भीड़ इक्कठी करने के लिऐ बुला लिया जाता है। वैसे अगर देखा जाय तो चुनाव का गणित बड़ा कठिन है और अन्तिम समय तक चुप्पी ओढ़े रहने वाला मतदाता कब किस करवट बैठेगा या फिर अपने मत के बदले उसे किस तरह का आश्वासन या सुविधा चाहिऐं होगी, यह समझ पाना एक टेढ़ा काम है लेकिन मतदाता के रूख के पारखी माने जाने वाले कुछ ज्ञानी-ध्यानी जन इन विषयो में विशेष निपुणता रखते है और उन्हे यह समझने में देर नही लगती कि क्षेत्र विशेष का मतदाता अपने नेता से क्या उम्मीदें रखता है। व्यवसाय में तब्दील हो चुकी राजनीति के इस दौर में जनसेवा के बदले हुऐ मायने आम आदमी समझ चुका है, इसलिऐं सिर्फ रोजमर्रा के खर्चो या फिर तत्काल राहत देने वाली घोषणाओ के बल पर उसे टरकाया आसान नही है और न ही अब राजनीति का वह दौर है जब कार्यकर्ता बिना किसी स्वार्थ के विचारों या सिद्धान्तो के आधार पर अपना नेता चुनता था लेकिन इस सबके वावजूद चुने जाने के लिऐ चुनाव में भागीदारी कर रहे हर नेता से यह उम्मीद की जाती है कि वह जनता की हर कसौटी पर खरा उतरे और चुनाव जीत जाने के बाद भी अपने सहयोगियों व मतदाताओं के बीच बना रहे। सरकार ने भी जनप्रतिनिधि की इस समस्या को समझतें हुऐ उसके चुनाव क्षेत्र के लिऐ विधायक या संासद निधि जैसी पुख्ता व्यवस्थाओं के माध्यम से यह कोशिश की है कि चुनाव के बाद भी नेता को अपने पर विश्वास करने वाली जनता को निराश न लौटाना पड़े तथा छोटी हो चुकी विधानसभाओ के चलते हर मतदाता केा व्यक्तिगत् रूप से सन्तुष्ट करने के लिऐ विधायको व अन्य तथाकथित जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष की बन्दरबाॅट का रास्ता निकाल लिया है लेकिन इस सबके वावजूद पिछले चुनाव में विजयी तमाम प्रत्याशी परेशान व दौड़भाग में व्यस्त है और अपने विधानसभा क्षेत्रो में जनसम्पर्क के दौरान आने वाली कई तरह की परेशानियों ने उनके होश उड़ाये हुऐ है। नजदीक से देखने में यह अन्दाजा लगाना मुश्किल नही है कि समय गुजरने के साथ ही साथ अपने जनप्रतिनिधियों से जनता की अपेक्षाऐं व महत्वांकाक्षाऐं बढ़ती जा रही है और चुनाव दर चुनाव सामने आने वाले नये चेहरो व नेता बनने के इच्छुक ठेकेदारों, प्रापर्टी के दलालो या फिर दिल्ली-मुंबई से पहाड़ की ओर रूख करने वाले धन्धेबाजो की बढ़ती संख्या देखते हुऐ स्थानीय स्तर पर यह मान लिया गया है कि चुनावी वैतरणी में डुबकी लगा विधायक या मन्त्री बनने की इच्छा रखने वाले इन तथाकथित नेताओ से चुनावों से पहले जितना भी फायदा उठाया जा सके, उसे उठा लेने में केाई हर्ज नही है। हाॅलाकि चुनावी मौसम में प्रत्याशियो, उनके समर्थको या फिर सत्ता सुख भोगने के लिऐ बैचेंन राजनैतिक दलो द्वारा इस तरह की छोटी-मोटी सुविधाऐं दिया जाना या मतदाता के किसी वर्ग को उसकी सुविधा के अनुसार तत्कालिक लाभ दिया जाना कोई नई बात नही है और लगातार कड़े होते जा रहे चुनाव आयोग के नियम व कानूनों के दायरें में इस तथ्य का पूरा ध्यान रखने की कोशिश भी की जाती है कि कोई राजनैतिक दल या प्रत्याशी इस तरह के छोटे लालच के चलते जनमत का सौदागर न बन जाये लेकिन जन जागरूकता के आभाव मे इसपर पूर्णतः रोक लगाया जाना सम्भव नही दिख रहा है और छोटे-छोटे लालच या वायदे पूरे करने वाले प्रत्याशियों द्वारा आम जनता के हित में विशेष तबज्जों न दिये जाने के कारण इस पहाड़ी राज्य का विकास व विकास से जुड़े मुद्दे काफी पीछे छूट गये है। यह एक आश्चर्यजनक सत्य है कि लोकप्रिय नेताओ की भारी कमी के कारण दल-बदल व सरकार बनाने-गिराने के खेल से जूझ रहे उत्तराखण्ड में आम चुनावों के दौरान तमाम बड़े-बड़े नेता व सरकार के मन्त्री अपने-अपने क्षेत्रो तक सीमित दिखते है और सरकार बनाने के दावे के साथ सत्ता के रण में कूदी भाजपा को तो जिताऊ उम्मीदवारों की तलाश में काॅग्रेस व अन्य दलो के बड़े नेताओ की ओर देखना पड़ा है। हालात इशारा कर रहे है कि जनान्दोलनो की कोख से जन्मा तथा स्थानीय स्तर पर कई बड़े जनान्दोलन खड़ा करने में कामयाब रहा उत्तराखण्ड वर्तमान में जन सरोकारों वाले नेताओ की कमी से जूझ रहा है और यहाॅ होने वाले छोटे-बड़े चुनावों में भागीदारी कर जनप्रतिनिधि बनने या राजनेैतिक दल का गठन करने की इच्छाओ के साथ जनता के बीच आने वाले नेताओ की एक बड़ी भीड़ के वावजूद भी जनपक्ष को जनता की अदालत के माध्यम से सरकार व सत्तापक्ष के समक्ष रखने में सक्षम जनप्रतिनिधि का आभाव स्पष्ट झलकता है। नतीजतन पेशावराना अन्दाज ले चुकी राजनीति के इस दौर में कई स्थापित नेताओ की अगली पीढ़ी या तो चुनावों में भागीदारी कर रही है या फिर एकदम तैयार दिखती है लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ दो-चार चुनाव जीत लेना ही एक परिपक्व नेता की पहचान मानी जा सकती है। शायद ऐसा नही है क्योंकि अगर ऐसा होता तो एक के बाद एक कर कई लोकसभा चुनाव लगातार हारने के वावजूद भी हरीश रावत आज जनप्रिय नेता नही कहलाते और न ही विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री जैसे सम्मानित पद पर पदासीन होने के बाद बगावत के जरिये दूसरे दरवाजे तलाशने की जरूरत होती।

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