Saturday, March 25, 2017

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जो मेरा कातिल है, वही मेरा मुंसिफ भी है

सेना के जवानो की शिकायतों पर सरकार मौन, सेना के उच्च अधिकारियो पर ही छोड़ा जाॅच का फैसला।
सेना के सम्मान की राजनीति केन्द्रीय सत्ता पर काबिज भाजपा को भारी पड़ती दिख रही है और सर्जिकल स्ट्राइक पर वाहवाही लूटने वाले भाजपा के नेताओं को सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दो पर कुछ कहते ही नही बन रहा है। ध्यान देने योग्य विषय है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में नोट बन्दी के मामले में ऐसा ही कुछ माहौल बैंक कर्मियों के लिऐ भी बनाया था और नोट बन्दी के शुरूवाती दौर में मोदी भक्त बैंक कर्मियों के जज्बे को सलाम करते नही थक रहे थे लेकिन शीघ्र ही सरकार ने अपने सूत्रो का हवाला देकर इन्ही बैंक कर्मचारियों पर चोर दरवाजे से नोट बदलने के आरोप लगाये और बैंक कर्मियों के संगठनो ने कार्य का दबाब बढ़ने के कारण हुई कुछ बैंक कर्मियों की मौत का ठीकरा सरकार के सर फोड़ते हुऐ अपने लिऐ राहत की मांग की। बैंक कर्मी संगठित है और मजबूत श्रमिक संगठनो का हिस्सा होने के कारण वह अपनी तमाम छोटी-बड़ी समस्याओं को सरकार तक पहुॅचा पाने में सफल भी रहे लेकिन सेना के जवान इतने खुदकिस्मत नही है और न ही फौज के कानून उन्हे ऐसा कोई संगठन बनाने की इजाजत देते है जो कि किसी भी फोरम के समक्ष जवानो की समस्याओं व उत्पीड़न के किस्सो को कानून के दायरे में रहकर उठा सके। शायद इसीलिऐ एक जवान ने परेशान होकर अपनी समस्याओं को सूचना तकनीकी के आधुनिक संसाधनो के जरिये जनसामान्य से साझा करने की कोशिश की। हो सकता है कि सेना के प्रति जन सामान्य के उमड़ रहे जज्बातों और सीमा पर तैनात जवानो की जय जयकार से भावुक होकर इस जवान ने अपनी व अपने साथियो की तमाम समस्यायों में से कुछ को सीधे जनता के साथ साझा करके यह माना हो कि देश के प्रधानमंत्री तक अपनी बात पहुॅचाने का यह आसान व सुगम तरीका हो सकता है लेकिन मीडिया बीच में ही इन बातो को ले उड़ा और सरकारी पक्ष की ओर से इन समस्याओं का समाधान ढूढने की जगह इनपर सुलह सफाई प्रस्तुत करने व फौज को पाक-साफ दिखाने का अभियान शुरू हो गया। इस अभियान के चलते सेना के कुछ वरीष्ठ अधिकारियों ने अपने सैनिकों को ताकीद दी कि वह अपना अनुशासन बनाये रखे और इस तरह के विषयो पर नियमों के अनुकूल ही चर्चा या शिकायत करे। सेना की खामियों को सीधे जनता की अदालत व केन्द्र सरकार के सम्मुख रखने की कोशिश करने वाले जवान को आनन-फानन में ही भ्रष्ट व आदतन शराबी घोषित करने की कोशिश की गयी और उसके द्वारा दिये गये समय से पूर्व सेवानिवृत्त किये जाने के आदेश को दरकिनार कर उसे अज्ञात जगह भेज दिया गया। खबर है कि वर्तमान मे उसका परिवार उससे किसी भी तरह का सम्पर्क नहीं कर पा रहा और न ही स्थानीय शासन, प्रसाशन अथवा मीडिया का एक बड़ा हिस्सा उसकी किसी भी तरह की मदद के लिऐ तैयार है। हाॅलाकि सेना में भ्रष्टाचार के किस्से किसी भी देश के लिऐ नये नही है लेकिन सेना के अपने कानूनों व अनुशासन के नाम पर इन्हे सैन्य कैम्पो की चारदिवारी से बाहर नही आने दिया जाता और न ही सामान्य जनता को इन तथ्यो से ज्यादा वास्ता रहता है कि देश की सीमाओं की रक्षा के लिऐ सीमा पर तैनात जवान को क्या, कैसे और कितनी सुविधाऐं दी जा रही है। यह ठीक है कि देश की जनता को यह अहसास होना जरूरी है कि उसकी सीमाओं की रक्षा के लिऐ सेना किस हद तक विपरीत परिस्थितियों का सामना करती है और देश की रक्षा के लिऐ अपने प्राणो की परवाह न करते हुऐ विषम परिस्थितियों में सीमा पर तैनात जवानो की हौसलाफजाई के लिऐ इनके बीच सत्ता पक्ष के बड़े नेताओ या सरकार के ओहदेदारो के अलावा तमाम नामी-गिरामी फिल्मी हस्तियों व अन्य सम्मानित व्यक्तित्वों का जाना गलत भी नही माना जाता लेकिन सेना को मोहरा बनाकर राजनैतिक बढ़त लेने की कोशिश या फिर सत्ता पक्ष की जय-जयकार करते हुऐ सिर्फ माहौल बनाने के लिऐ सेना को महिमामण्डित करने की कोशिश किसी सरकारी तन्त्र को इस तरह भारी पड़ सकती है, यह किसी ने सोचा भी नही होगा। मौजूदा माहौल में मोदी सरकार की मुश्किल यह है कि अगर वह एक सैनिक द्वारा सीधे जनता की अदालत में की गयी शिकायत के आधार पर इन तमाम विषयो की जाॅच करती है तो इससे सेना का अनुशासन भंग होता है और अगर वह इस तरह की शिकयतोें को नजरदांज करते हुऐ सेना को उसकी ही हालत पर छोड़ देती है तो विपक्ष समेत जनपक्ष के भी एक बड़े हिस्से द्वारा सरकार पर इस भ्रष्टाचार में शामिल होने के आरोंप लगाये जा सकते है। शायद इसीलिऐं सरकार ने सेना के कुछ उच्चाधिकारियों को विश्वास में लेते हुऐ उनके माध्यम से सैनिकों द्वारा लगाये जाने वाले आरोंपो की जाॅच की आश्वासन दिया है और सेना द्वारा कुछ विशेष नम्बर जारी करते हुऐ सैनिको से अपील की गयी है कि वह अपनी शिकायत इन नम्बरों या उचित माध्यम से सेना के वरीष्ठ अधिकारियों तक पहुॅचाये । तकनीकी रूप से यह तरीका सही लगता है और ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार की मंशा इस समस्या के न्यायपूर्ण समाधान की है लेकिन सवाल यह है कि सैनिक की तो शिकायत ही अपने उच्च अधिकारियों के खिलाफ है और अपने खिलाफ होने वाली इन शिकायतो पर वह कितनी तबज्जो देंगे या फिर इन शिकायतो की जाॅच के नाम पर होने वाली कार्यवाही के तहत शिकायतकर्ता केा किस हद तक उत्पीड़न से गुजरना पड़ेगा, कहा नही जा सकता। ‘जो मेरा कातिल है, वही मेरा मुंसिफ भी है’ वाले अन्दाज में सरकार द्वारा सेना में उठ रहे विरोध के सुरो पर लिया गया यह फैसला जनता की समझ में भी नही आ रहा है लेकिन केन्द्र की भाजपा सरकार को सैनिको के हितो या उनकी शिकायतो के निस्तारण से कही ज्यादा चिन्ता अपना वोट बैंक बचाने की है और वह किसी भी हालत में जनता को इन चर्चाओ से दूर रखना चाहती है।

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