Saturday, April 29, 2017

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इसमें तो कुछ खास नहीं

सरकार द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किये गये बजट पर पहली नजर

यह माना जा रहा था कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावो को ध्यान में रखते हुऐ अपना आम बजट वक्त से थोड़ा पहले ला रही केन्द्र सरकार कुछ लोकलुभावन घोषणाओं और राहतों के जरिये आम आदमी का ध्यान अपनी ओर आकृर्षित करने की कोशिश करेगी और नोटबंदी से आहत सामान्य जनता को आंकड़ो के माध्यम से यह समझाने की कोशिश की जायेगी कि उनको हुई कुछ दिन की परेशानी से सरकार ने क्या कुछ लाभ अर्जित किया है लेकिन इस बजट में ऐसा कुछ भी नहीं था और न ही रेल बजट को अलग से प्रस्तुत करने की परम्परा में बदलाव लाकर सरकार कुछ नयी उपलब्धि हासिल कर सकी। हांलाकि राजनैतिक चंदे के लिऐ तय की गयी नकद की न्यूनतम सीमा अपने आप में एक ऐतिहासिक कदम हो सकती थी लेकिन जब तक देश के राजनैतिक दलो को आरटीआई के दायरें में लाकर उनकी आय और व्यय के ब्योरे को सार्वजनिक नही किया जाता तब तक इस तरह की सीमा रेखा निर्धारित करने का कोई औचित्य नहीं है बल्कि अगर चुनावों के दौरान नेताओं द्वारा खर्च किये जाने वाले धन व आयोग के समक्ष दिये जाने वाले ब्योरे पर गौर करे तो यह स्पष्ट दिखता है कि किसी भी राजनैतिक दल अथवा प्रत्याशी द्वारा इस मामले में पारदर्शिता नही बरती जाती। इसलिऐं बिना किसी ठोस इन्तजामात के इस तरह की व्यवस्थाऐं करना राजनीति में कालेधन को इस्तेमाल को बढ़ावा ही देगा। सरकार का दूसरा बड़ा फैसला आयकर के संदर्भ में है और यह माना जा रहा है कि सरकार द्वारा डिजिटल पेंमेन्ट पर जोर दिये जाने के चलते व्यापारियों के काम में पारदर्शिता आयेगी तथा आयकर का दायरा बढ़ाये जाने के बावजूद सरकार को मिलने वाले कर में बढ़ोत्तरी होगी। हाॅलाकि साॅतवें वेतन आयोग में दर्ज की गयी वृद्धि के बाद यह तय माना जा रहा था कि सरकार आयकर का दायरा बढ़ाऐगी और इस संदर्भ में नियमों को सख्त करते हुऐ बिना कोई कर दिये मोटा लेन देन करने वालो पर शिकंजा कसा जायेगा । अपनी घोषणा के जरिये सरकार ने नियमित रूप से आयकर जमा करने वालो को आयकर का दायरा बढ़ाकर कुछ राहत देने की जरूर की है लेकिन सरकार आम आदमी की आय बढ़ाने की दिशा में किसी भी तरह के प्रावधान करने से हाथ खड़े करती दिखाई देती है और सरकार के अन्दाज व सम्पूर्ण बजट के अवलोकन के माध्यम से दूर-दूर तक यह नही लगता कि सरकार नये लोगो के लिऐ रोजगार के संसाधन जुटाने अथवा बेरोजगारों को रोजगार देने की दिशा से बजट के माध्यम से कुछ करना चाहती है। सरकारी तन्त्र को यह समझना चाहिऐं कि सामान्य जनमानस के एक बड़े हिस्से को अपनी कमाई का एक हिस्सा टैक्स के रूप में सरकार को देने से कोई परहेज नहीं है और न ही देश की 125 करोड़ की आबादी की अधिसंख्य जनता भ्रष्ट या बेईमान है जो जानबूझकर कर के दायरे से बचना चाहती है। हकीकत यह है कि सकरार द्वारा निर्धारित किये गये कर ढाॅचे में इतने पेंच और बाबूगिरी है कि तमाम छोट-मोटे व्यवसायी जानबूझकर इस पचड़े से दूर रहना चाहते है तथा आयकर के दायरें में आने से बचने के लिऐ या फिर बैंको की कागजी खानापूर्ती पूरी करने के नाम पर वह दलालो को इतना पैसा दे रहे है कि उसका एक हिस्सा ही सरकार द्वारा वार्षिक रूप से लिऐ जाने वाले आयकर से ज्यादा है। इसलिऐं सरकार ने अपनी आय बढ़ाने के लिऐ अन्य टोटको का सहारा लेने की जगह अपनी ढांचागत् व्यवस्था में सुधार करना चाहिऐं और आयकर दाताओं व सामान्य जनता को यह बताना चाहिऐं कि इस कर की एवज में सरकार उसे विशिष्ट नागरिक के रूप में क्या सुविधाऐं प्रदान कर रही है ? सरकार ने यह समझना होगा कि संाकेतिक रूप से दो चार एम्स या मार्डन स्कूल खोलने से जनता का कोई भला नही होने वाला बल्कि अगर सरकार आयकर दाताओ को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रो में विशेष सुविधाऐं प्रदान करे तो आयकर देने वालो की संख्या में तेजी से इजाफा हो सकता है लेकिन सरकार शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी जनसुविधाओ को निजीकरण की राह में धकेलते हुऐ जनहित के इन विषयों से मोटी आय वसूलने की तैयारी में दिखती है और अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं की ओर से निश्चिन्त होने के लिऐ मध्यम वर्ग द्वारा खरीदी जाने वाली चिकित्सा सम्बन्धी पालसियों पर अलग से सेवाकर लगाकर सरकार ने अपनी मंशा को जता दिया है। अपने इस बजट में सरकार ने कुछ लम्बे समय में फायदा देने वाले प्रावधानो का जिक्र भी किया है तथा मनरेगा जैसी जनहितकारी योजनाओ में भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम करने के लिऐ इनकी सेटेलाइट द्वारा मानींटरिग व कानूनों को सख्त करने जैसी बाते भी सामने आयी है लेकिन यह देखने योग्य विषय होगा कि सरकार अपने इन प्रावधान व घोषणाओ को कितनी तत्परता से लागू कर पाती है और आगामी वर्ष में जनता के बीच रखे जाने वाले बजट (जो कि एक चुनावी बजट होगा) के वक्त तक किन-किन योजनाओं को शुरूवाती अमलीजामा पहनाने में सरकार कामयाब रहती है।

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