Saturday, May 27, 2017

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अराजकता की हद

कानून को हाथ में लेकर अपना ऐजेण्डा लागू करने की कोशिश कर रही है कट्रवादी ताकतें।

अपने एक सूत्रीय अभियान के तहत भाजपा से सम्बद्ध एक गुट उग्र हिन्दुत्व के मुद्दे को हवा देकर मतदाताओं के बड़े वर्ग को अपने साथ बांध रखने की कोशिश कर रहा है और इस तथ्य को स्वीकार भी करना होगा कि सूचना एवं तकनीकी के तमाम संसाधनों का उपयोग करने में निपुण इस गुट को अपने प्रयासों में आशातीत सफलता भी मिल रही है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि जिस्मानी ताकत के बलबूते अपना ही ऐजेण्डा लागू करने निकले इन तथाकथित मोदी के प्रशसंको व भाजपा के पक्षधरो को यह लगता है कि वह कानून से उपर उठकर अपने धर्म एंव सीमाओं की रक्षा करते हुये राष्ट्रहित में बड़ा योगदान दे रहे है और हिन्दुस्तान की सीमाओं को सुरक्षित बनाने के लिऐ इतिहास को उनकी नजरों से देखा जाना व देश की आबादी के एक हिस्से को दोयम दर्जे का नागारिक मानना जरूरी है लेकिन वह इस तथ्य को स्वीकार करने के लिऐ तैयार नही है कि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता के शीर्ष पर काबिज उनके नेता अपनी कुर्सी को बचाये रखने के लिऐ ही उनके इस तथाकथित हिन्दुत्ववादी ऐजेण्डे को स्वीकारने से बच रहे है और उन्हें मोहर बनाते हुऐ मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को धार्मिक आधार पर बरगलाने या फिर एक धर्म विशेष के विरूद्ध भड़काने के लिऐ तैयार किया जा रहा है या फिर यह भी हो सकता है कि भाजपा का नीति निर्धारक माना जाने वाला संघ अपने वोट-बैंक को एकजुट रखने तथा अपने हिन्दुत्ववादी ऐजेण्डे का दबाव बनाये रखने के लिऐ अपने अधीनस्थ या सहयोगी संगठनो माध्यम से इस तरह के कृत्य को अंजाम दे रहा हो और उसे लगता हो कि इस प्रकार एक वर्ग विशेष के बीच डर और दूसरे वर्ग के बीच श्रेष्ठता का भाव कायम कर वह वर्तमान सरकार की खामियों को ढक सकता है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि पिछले तीन वर्षो में अपने ऐजेण्डे से हटती दिखाई दे रही मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार मॅहगाई और भ्रष्टाचार को कम करने में पूरी तरह असफल रही है तथा अपने घोषणापत्र व ऐजेण्डे को एक तरफ रख पूर्ववर्ती सरकारों के ढर्रे पर ही काम कर रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश की जनता को यह बताने में असफल रहे है कि उनकी विदेश यात्राओं व विचारधारा का देश की जनता को क्या फायदा मिला है ? सरकार यह स्पष्ट करने में पूरी तरह नाकामयाब है कि अन्र्तराष्ट्रीय बाजार में तेजी से कम हुई कच्चे तेल की कीमतें के बावजूद वह पेट्रोल और डीजल की कीमतों को कम करने अथवा खुदरा बाजार पर नियन्त्रण रखते हुऐ दाल या अन्य कृषि उत्पादो की कीमतों में एकाएक ही होने वाली मूल्य वृद्धि पर रोक लगाने में नाकामयाब क्यों है। नोटबन्दी के बाद आम आदमी को हुई परेशानियों तथा नोटबन्दी के फैसले से सामने आये काले धन को लेकर भी सरकार के पास कोई जवाब नही है और न ही वह आम आदमी को ज्यादा रोजगार के अवसर देने या फिर बेहतर जनसुविधाऐं देने के मसले पर अपने वादे पर खरी उतरी है। इन तमाम असफलताओं के बीच स्पष्ट रूप से कम होता दिख रहा मोदी सरकार का जादू यह इशारा कर रहा है कि आगे आने वाले चुनावों में मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से नीचे गिरता दिखाई दे सकता है और मोदी को सत्ता की कुंजी थमाने वाला युवा मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा सरकार की वादाखिलाफी से नाराज हो उससे दूर छिटक सकता है। हालातों के मद्देनजर मोदी को चाहिए था कि वह अपनी कार्यशैली में सुधार करते हुऐ आम जनता का दिल जीतने की कोशिश करते और व्यापक जनहित में कई सुधार व नई योजनाऐं लागू कर जनसामान्य के बीच यह सन्देश देने की कोशिश की जाती कि कई गलतियों व तकनीकी खामियों के बावजूद भी वर्तमान केन्द्र सरकार आम आदमी के हित को लेकर चिन्तित है लेकिन भाजपा के नीतिनिर्धारक माने जाने वाले संघ ने सरकार पर अपना ऐजेण्डा लागू करते हुऐ उसे यह सलाह दी मालुम होती है कि तथाकथित उग्र हिन्दूवाद के बूते इस हारी हुई जंग को एक बार फिर जीता जा सकता है तथा पिछली असफलताओं का जिक्र न करते हुऐ देश में तेजी से बढ़ रही मुस्लिमों की संख्या और पूर्व में की गयी इतिहास से छेड़छाड़ के नाम पर जनता को बरगलाते हुऐ एक बार फिर हिन्दुओं की एकजुट ताकत के जरिये सत्ता पर कब्जेदारी बनायी रखी जा सकती है। हो सकता है कि संघ का यह तरीका काफी हद तक कारगर भी हो और समाज के तमाम छोटे-बड़े तबको के बीच आम तौर पर दिखने वाली समस्याओं को आधार बनाकर किया जाने वाला यह विभाजन चुनावी मोर्चे पर एक निर्णयायक हथियार भी साबित होता हो लेकिन इस तरीके में हिंसा का पुट देते हुऐ युवाओं को कानून तोड़ने के लिऐ उकसाना या फिर बलपूर्वक अपनी मनमर्जी लागू कराने की कोशिश करना किसी भी तरह सही नही कहा जा सकता । अफसोसजनक पहलू है कि मोदी राज में यहीं सबकुछ होता दिख रहा है और खुद मीडिया के एक बड़े हिस्से पर हमलावर सरकार अपने समर्थकों को उकसा रही है कि वह समाज में बदलाव लाने वाले व नेताओ की कमियों को इंगित करने वाले बड़े व सशक्त माध्यमों पर अपने डर का साम्राज्य कायम करते हुऐ उन्हें अपने इशारे पर चलना सिखायें। हाल ही में फिल्मों के निर्माता निर्देशक संजय लीला भंसाली पर राजस्थान में एक फिल्म की शूंटिग के दौरान हुआ हमला तथा इससे पहले शाहरूख खान, सलमान खान, या फिर आमिर खान पर हुआ बयानो का हमला और कुछ चुनिन्दा फिल्मों को बाजार में लाने के लिऐ गुण्डा टैक्स वसूले जाने की खबरें इस तथ्य को भी प्रमाणित करती है। हाॅलाकि फिल्मो, समाचार पत्रो या स्कूली पाठ्यक्रम पर रोक लगाने की माॅग कट्टपंथियों के किसी भी वर्ग के लिऐ नयी नहीं है और तमाम उग्रवादी संगठनो समेत समाज तक नयी चेतना न पहुॅचने देने की चाह रखने वाले अराजक तत्व इस तरह का प्रयास करते ही रहते हैं लेकिन किसी भी लोकतान्त्रिक देश में तथाकथित रूप से जनमत को अपने पक्ष में करने के लिऐ अंजाम दिये जाने वाला यह अपने आप में ही एक अनूठा घटनाक्रम है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि जनतान्त्रिक व्यवस्थाओं में सम्पूर्ण रूप से भागीदारी के बावजूद कुछ संगठनो को छदम्नामों से इस तरह की व्यवस्थाऐं लागू करने में सफलता भी मिल रही है तथा व्यवस्थाओं को ठीक करने के नाम पर या फिर समाज के एक वर्ग विशेष की एकजुटता के नाम पर वह इस तरह के फैसलो को अंजाम भी दे रहे है। वर्तमान तक स्थानीय स्तर पर पत्रकारों के छोटे-समूह इस प्रकार के घटनाक्रम की स्थिति में घटना के पीछे छिपे सच को सामने लाने का प्रयास करते रहे है तथा अपनी जान हथेली पर रखकर अंजाम दिये जाने वाले इस प्रकार के कृत्यों की बदौलत ही समाज को विभाजित करके लम्बे समय तक राज करने की चाह रखने वाला यह तबका अभी भी सफल नही हो पा रहा है लेकिन इधर सरकार ने नियम कानूनों में फेरबदल कर स्थानीय स्तर पर काम करने वाले व निर्भीक रूप से खबरों का खुलासा करने वाले इस मेहनतकश वर्ग की कमर तोड़ने का इन्तजाम कर लिया है और अराजक तत्वो के सहयोग से सरकार चलाने की इच्छा रखने वाले सत्तापक्ष ने सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ बड़े व्यवसायिक ग्रुपो के अलावा चुनिन्दा व्यवसायिक मानसिकता वाले बड़े समाचार पत्रो व टीवी चैनलो को वरदहस्त प्रदान करते हुऐ सही खबर को आम आदमी की पहुॅच से दूर करने की ठानी है। हाॅलाकि सरकार तन्त्र अपने प्रयासो में अभी पूरी तरह सफल नही हुआ है और सरकार चलाने वाले राजनैतिक दल की सहयोगी विचारधारा के इशारे पर होने वाली हर छोटी-बड़ी आक्रामक कार्यवाही पर टीका-टिप्पणी का दौर जारी है लेकिन यह सिलसिला ज्यादा लम्बा चल पायेगा, इसमें अब सन्देह होने लगा है।

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