भ्रष्टाचार के दल-बदल में उत्तराखंड | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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भ्रष्टाचार के दल-बदल में उत्तराखंड

राज्य निर्माण के बाद तेजी से बदले हालातों में पीछे छूट गया आम आदमी का हित।

समय गुजरने के साथ-साथ चुनावों को लेकर उत्सुकता व अपेक्षा बढ़ रही है तथा राजनीति में दिलचस्पी रखने वाला हर आमोंखास अपने-अपने दायरे में रहकर आंकड़ो की बाजीगरी के माध्यम से चुनावी हार-जीत के समीकरण लगाने में जुट गया है। हांलाकि प्रत्याशियों ने अभी पूरी तरह चुनावी ताल नही ठोकी है और निर्दलीयों को चुनाव चिन्ह आंबटित किये जाने व नाम वापसी के बाद ही स्थितियां सामने आने का इंतजार किया जा रहा है लेकिन अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में त्रिकोणीय संघर्ष के आसार नजर आ रहे है और कुछ छोटे राजनैतिक दल व निर्दलीय प्रत्याशी इस मुकाबले को चर्तुष्कोणीय या बहुकोणीय करने का प्रयास कर रहे है। इन हालातों में चुनावी हार-जीत को लेकर कुछ भी कह पाना असंभव नही तो मुश्किल जरूर प्रतीत हो रहा है और सम्पूर्ण उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में यह कह पाना कि जनता इन चुनावों के माध्यम से कोई बड़ा बदलाव चाहती है, एक बड़ा राजनैतिक विद्रुप सा सुनाई दे रहा है हांलाकि यह मानने का कोई बड़ा कारण नही है कि चुनाव नतीजों के बाद बनने वाली तथाकथित रूप से जनहितकारी सरकार सम्पूर्ण उत्तराखंड स्तर पर कोई बड़ा आर्थिक या सामाजिक बदलाव लाने की कोशिश ही नही करेगी और सरकार के गठन के साथ ही साथ तमाम घोषणाओं व घोषणापत्रों को एक तरफ रख दिया जायेगा लेकिन पिछली सरकारों की कार्यशैली व सत्ता की चाह में चुनावी घमासान के लिऐ मैदान में उतरें वहीं पुराने चेहरे यह इशारा जरूर कर रहे है कि चुनावी जीत के बाद तमाम राजनैतिक चेहरे अपने-अपने ऐजेण्डे व अपने-अपने स्वार्थों को आगे कर मोर्चा संभाल लेंगे। यह ठीक है कि सरकारी तंत्र के ठीक से काम न करने की एक बड़ी वजह नौकरशाही का शासन पर हावी होना मानी जाती है तथा इस तथ्य से भी इनकार नही किया जा सकता कि भ्रष्टाचार के उच्चतम् पायदान पर पहुंच चुका उत्तराखंड के नौकरशाहों का मनमाना रवैय्या सरकारी धन व योजनाओं की बंदरबांट का एक बड़ा कारण है लेकिन नौकरशाह, व्यापारी एंव राजनेता वर्ग की आपसी सांठगांठ के किस्से अब इस प्रदेश के लिऐ भी नये नही है और सरकारी नौकरशाही के स्थानांतरण व नियुक्ति को लेकर चल रहे धन के लेन-देन के खेल ने सत्ता के शीर्ष में बैठे नेताओं की बोलती बंद कर दी है। हम यह तो नही कहते कि हालातों में सुधार नही लाया जा सकता और सरकार बनाने या बिगाड़ने के इस खेल में अहम् किरदार निभाने वाला आम मतदाता बस यूं ही अपनी मेहनत की कमाई को जाया होते देखता रहेगा लेकिन चुनाव मैदान में उतरें प्रत्याशियों का अंदाज और सत्ता के शीर्ष पर बने रहने के लिऐ एक राजनैतिक दल से दूसरे राजनैतिक दल को दौड़ लगाते नेता यह इशारा दे रहे है कि वह इतनी आसानी से कोई बड़ा बदलाव नही आने देंगे । इन हालातों में यह एक बड़ा सवाल हो सकता है कि अगर आम आदमी की समस्यायें व जनसामान्य के मुद्दे जस के तस ही बने रहते है तो फिर इस चुनाव या फिर तथाकथित बदलाव के नारे के क्या फायदा। इतिहास गवाह है कि राज्य में बनने वाली पहली जनता के बीच से चुनी गयी सरकार के मुखिया के रूप मे आगे आये पं. नारायण दत्त तिवारी ने अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिऐ सरकार में संगठन की भागीदारी के नाम पर दायित्वों और लालबत्तियों की ऐसी बंदरबांट की कि आगे आने वाली कोई भी सरकार कार्यकर्ताओं के दबाव के नाम पर जनता को चुभाऐं जाने वाले इस दंश से राज्य को मुक्ति नही दिला सकी जबकि इन पन्द्रह सालों में दायित्वधारियों या फिर दर्जा प्राप्त मन्त्रियों के रूप में सामने आये तथाकथित माननीयों की कारगुजारियों पर गौर करें तो इनके खाते में ऐसा कुछ भी नही है जिसे व्यापक जनहित का नाम देकर आम आदमी के लिऐ फायदे का सौदा कहा जा सकें। हाँ इतना जरूर है कि खुद को राज्य मंत्री या दर्जा प्राप्त दायित्वधारी कहलायें जाने की ठसक में इन तमाम महानुभावों ने राज्य सरकार पर अपनी घोड़ा-गाड़ी व रोब-दाब गालिब करने वाले गनर-ड्राईवर का खर्च तो डाला ही साथ ही साथ इनमें से कई बड़े नाम गलतफहमी का शिकार होकर अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ चुनावी रण में कूदते दिखाई दिये। इसके बाद अगले मुख्यमंत्री के रूप में सामने आये तथाकथित रूप से कड़क मिजाज़ व ईमानदार व्यक्तित्व भुवन चन्द्र खंडूरी की बात करें तो इनके कार्यकाल में शासनतंत्र में बजी सांरगी की गूंज अभी भी सचिवालय में साफ सुनाई देती है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि खुद सेना के अवकाश प्राप्त वरीष्ठ अफसर होने के नाते इन्होंने अपने कार्यकाल में नेताओं से कहीं ज्यादा अधिकारियों को तवज्जों दी जिसके परिणामस्वरूप इस राज्य में बाजरिया नौकरशाह, चुनावी चंदा जमा किये जाने व अन्य नैतिक या अनैतिक कार्य किये जाने की चर्चाएं आम रही। उपरोक्त के अलावा खंडूरी के शासनकाल में गढ़वाल-कुमाँऊ के हर उस विवाद का हवा दी गयी जिसे राज्य की जनता उत्तराखंड आंदोलन के दौर में बहुत गहराई में दफन कर चुकी थी। भाजपा के इसी कार्यकाल में युवा नेता के रूप में रमेश पोखरियाल निशंक ने भी कुछ समय कार्यभार संभाला तथा अब तक के सबसे युवा मुख्यमंत्री रहे पोखरियाल का जुड़ाव उत्तराखंड की जमीनी समस्याओं से होने के कारण स्थानीय जनता को उनसे उम्मीदें भी बहुत थी लेकिन उनकी किचन कैबनेट के कमजोर होने के चलते उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के छोटे-बड़े तमाम आरोंप लगे तथा अपनी सरकार के फैसलो को अमलीज़ामा पहनाने से पहले ही वह कुर्सी से हटा दिये गये। अगर सरकार चलाने के लिऐ निशंक को पूरे पांच साल का वक्त और सही लोगों का सहयोग मिला होता, तो निशंक इ्र्र्र्र्र्र्रस प्रदेश के सबसे सफल मुख्यमंत्री साबित हो सकते थे लेकिन भाजपा के रणनीतिकारों ने उन्हें कभी खुलकर काम नही करने दिया और उनपर भ्रष्टाचार के जितने भी आरोंप लगे उन सबके पीछे कहीं न कही भाजपा के बड़े नेताओं व शीष नेतृत्व का हाथ साफ दिखाई देता है। इसके बाद बनी कांग्रेस सरकार में अनुभवहीन विजय बहुगुणा को आगे कर मुख्यमुंत्री बनाया गया और उस समय यह चर्चा भी खूूब चली कि उनके मुख्यमंत्री बनने की डील में उनके पुत्र व पुत्र की नियोक्ता कंपनी इण्डिया बुल्स का बड़ा हाथ रहा। बहुुगुणा के मुख्यमंत्री रहते-रहते उनके पुत्र साकेत की सरकार चलाने में अहम् भूमिका रही और कई मामलों में ऐसा लगा कि मानो कार्पोरेट कल्चर से आये साकेत ने इस प्रदेश को चलाने के लिऐ ठेकेदार नियुक्त कर दिये हो लेकिन आपदा के दंश ने भ्रष्टाचार में आंकठ तक डूबी बाप-बेटे की इस जोड़ी की पोल खोलकर रख दी और उन्हें नियुक्ति देने वाले हाईकमान ने एक बार फिर कठोर फैसला लेने के नाम पर उन्हें सत्ता से बेदखल कर हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि हरीश रावत ने पूरी शिद्धत के साथ मेहनत कर आपदा में तबाह हुऐ केदारनाथ क्षेत्र को न सिर्फ फिर खड़ा किया बलकि आश्चर्यजनक तरीके से यात्रा को दोबारा चला कर जनता के दिल को भी जीतने की कोशिश की। जनसामान्य से मिलने को उत्सुक नजर आने वाले इस मुख्यमंत्री के अपने परिवार में ही नेताओं की एक बड़ी भीड़ होने के बावजूद उनके बेटे या बेटी का किसी भी तरह का दखल सरकार चलाने की राजनीति में नही देखा गया लेकिन प्रदेश पर हावी नौकरशाही पर पूरी तरह काबू पाने में वह भी नाकाम रहे और उनके शासनकाल में दिखने वाले सत्ता के तमाम केन्द्र हमेशा चर्चाओं का विषय बने रहे। इस सबके बावजूद पहाड़ की समस्याओं के जानकार तथा पहाड़ की लोककला व लोकसंस्कृति को आगे लाने वाले मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें हमेशा याद किया जायेगा और इसमें भी कोई दो राय नही कि अगर राज्य की जनता ने उन्हें दोबारा काम करने का मौका दिया तो एक नई टीम के साथ वह अपने छूटे कार्यो को पूरा करने की कोशिश जरूर करेंगे लेकिन यह एक बड़ा सवाल है कि उनके कार्यकाल में केन्द्र सरकार द्वारा की गयी अघोषित आर्थिक नाकेबंदी के बाद हरीश रावत अपने लक्ष्य तक पहुंचने में कैसे कामयाब होंगे और राज्य की जनता के लिऐ नासूर बनते जो रहे तथाकथित दायित्वधारियों की फौज व इन माननीयों की सेवा में लगे तमाम सरकारी व संविदा कर्मियों के वेतन आदि मद में होने वाले खर्चो पर रोक कैसे लगायी जा सकेंगी। सरकार बनाने के लिऐ इच्छुक तमाम राजनैतिक दलों ने इस संदर्भ में अपना वक्तव्य अवश्य देना चाहिऐ।

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