Saturday, May 27, 2017

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आन्दोलन के बाद

जन अपेक्षाओ पर खरे नही उतरे क्षेत्रीय राजनीति के पेरोकार।

सत्ता में वापसी के लिऐ भाजपा एवं काॅग्रेस ने अपने प्रयास तेज कर दिये है और क्षेत्रीय दलो व छोटे राजनैतिक संगठनो के मुकाबले निर्दलीय प्रत्याशी ज्यादा शिद्धत के साथ इस चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास कर रहे है। थोड़े-बहुत बदलाव के साथ यह आॅकड़े उत्तराखण्ड की लगभग हर विधानसभा सीट पर फिट बैठते दिख रहे है और हमें यह कहने में कोई ऐतराज नही दिखता कि क्षेत्रीय राजनैतिक दलो के बड़े नेताओ ने अपनी छोटी महत्वाकांशाओ के आगे समर्पण कर दिया है। कहने को तो उत्तराखण्ड क्रान्ति दल अलग राज्य की अवधारणा को संगठित रूप से सामने रखने वाला पहला स्थानीय मानसिकता वाला दल है तथा परिवर्तन पार्टी, स्वराज्य मंच और रक्षा मोर्चा से तमाम बड़े-बड़े नामो व दावो के साथ खुद को राज्य की जनता का पैरोकार बताने वाली तमाम तथाकथित रूप से संघर्षशील ताकते भी चुनाव मैदान में है लेकिन चुनाव मैदान में मुद्दो का आभाव नजर आता है और आर्थिक संसाधनो की कमी का रोना रोते इन तमाम दलो के नेता चुनावी मोर्चे पर अच्छे व समर्पित प्रत्याशियों को आगे लाने में नाकाम दिखाई देते है। यह ठीक है कि उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के बाद सामने आये नतीजों के परिणाम स्वरूप आम आदमी की आन्दोलन में दिलचस्पी घटी है तथा राज्य आन्दोलन में भागीदारी के नाम पर चन्द लोगो को मिली सरकारी नौकरियों व पेन्शन ने जनसामान्य को यह मानने पर मजबूर किया है कि नेताओ व तथाकथित रूप से राज्य आन्दोलन के लिऐ समर्पित राजनैतिक दलो ने अपने हितो के लिऐ उसका शोषण ही किया है लेकिन इस सबके बावजूद भी पिछले सोलह सालो में ऐसे अनेक मौके आये जब यह तमाम क्षेत्रीय ताकतें एकजुटता के साथ सरकारों की कार्यशैली व लूटतन्त्र पर सवाल खड़े करते हुऐ आम आदमी के बीच अपने लिऐ जगह बना सकती थी किन्तु अफसोसजनक स्थिति है कि इन तमाम ताकतों ने जनता के मुद्दे उठाने की जगह सत्ता पक्ष के हितकर बने रहना या फिर राष्ट्रीय राजनैतिक दलो के मोहरो की तरह काम करना ज्यादा उचित समझा और छुटपुट स्थानीय मुद्दो पर आन्दोलन खड़ा करने वाली स्थानीय ताकतों ने जब भी सहयोग व समर्थन के लिऐ इन क्षेत्रीय राजनैतिक दलो की ओर निहारा तो इनके हाथ मदद के लिऐ आगे बढ़ते नही दिखे। हाॅलाकि लगभग हर विधानसभा चुनाव में स्थानीय जनता के एक हिस्से ने इन्हे सन्तुलन बनाये रखने की दृष्टि से विधानसभा में भेजा और सरकार बनाने के लिऐ जरूरी छत्तीस के आॅकड़े ने इन्हे सरकार में सम्मानित भूमिका दिलाने में भी मदद की लेकिन चुनाव दर चुनाव यह क्षेत्रीय ताकतें कमजोर होती नजर आयी और इनके आपसी झगड़ो के चलते सड़क पर होने वाली छिछालेदार ने इनके अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिये। वर्तमान में कुछ अलग-अलग नामो से यह तमाम क्षेत्रीय शक्तियाॅ एक बार फिर चुनाव मैदान में है और अगर गम्भीरता से गौर किया जाय तो उत्तराखण्ड राज्य में बनने वाली अगली सरकार में भी इनकी भूमिका से इनकार नही किया जा सकता लेकिन सवाल यह है कि सत्ता के शीर्ष पर पहुॅचने के बाद यह राजनैतिक ताकतें अपनी सोच और अपने उद्देश्यों से भटक क्यों जाती है तथा जनसामान्य के लिऐ एक लम्बा संघर्ष करने का दावा करने वाले इनके नेता कुर्सी सम्भालते ही अपने समर्थको से निगाहें क्येां फेर लेते है ? यह कुछ ऐसे सवाल है जिनके जवाब की तलाश हमें एक बार फिर उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के इतिहास में ले जाती है और एक लम्बे संघर्ष के बाद गठित उत्तराखण्ड राज्य की शुरूवाती सरकारों पर सवाल उठने शुरू हो जाते है। कोई भी राजनैतिक दल इस तथ्य का तर्कपूर्ण जवाब नही दे सकता कि किन कारणो से इस नवगठित राज्य की राजधानी देहरादून बनायी गयी और सीमित संसाधनो वाले इस राज्य में एक जनहितकारी सरकार चलाने के लिऐ सैकड़ो की संख्या में राज्य मन्त्रियों या दायित्वधारियों का बनाया जाना जरूरी समझा गया। सरकारी कामकाज चलाने के लिऐ स्थायी कर्मकारों के स्थान पर संविदा, ठेकेदारी या आउटसोर्सिग जैसे तमाम नामो से अस्थायी कर्मचारियों की भर्ती किया जाना तथा नये-नये आयोगो में सेवा निवृत नौकरशाहों को स्थायी आधार पर नियुक्ति दिया जाना किस तरह राज्य की जनता के लिऐ कल्याणकारी हो सकता था, इस तथ्य को वर्तमान तक भी कोई समझ नही पाया। सचिवालय का कामकाज चलाने के नाम पर अन्य विभागो के वरीष्ठ कर्मियो को सचिवालय में ही समाहित कर दिये जाने के चलते कर्मकारों की कार्यदक्षता पर तो प्रभाव पड़ा ही साथ ही साथ जनसामान्य के बीच यह सन्देश भी गया कि राज्य बनने के बाद मची ‘लूट की खुली छूट’ में उस जनता की फिक्र किसी को नही है जिसने इस राज्य के गठन के लिऐ लम्बी लड़ाई लड़ी है। निहित स्वार्थो में डूबे इन क्षेत्रीय दलो के नेता निजी कारणो से इन तमाम विषयो पर अपनी चुप्पी बनाये रहे और जल, जंगल व जमीन से जुड़े मुद्दो को दरकिनार कर सिर्फ लफ्फाजी के आधार पर चुनावों को जीतने की कोशिशें जारी रही। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह कि अपनी हार या कमजोर होते जनाधार के लिऐ यह तमाम क्षेत्रीय दलो के नेता स्थानीय जनता या फिर जनमत से बनने वाली जनहितकारी सरकारों को दोष नही दे सकते और न ही खुद को उस महती जिम्मेदारी से अलग कर सकते है जो उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के रूप में उन्होने अपने कन्धो में ली थी। गौरेतलब है कि उत्तराखण्ड राज्य का गठन करने का दावा करने वाली भाजपा ने उत्तराखण्ड को संवारने के नाम पर नई पीढ़ी के नेताओं को चुनाव मैदान में उतारने का काम शुरू कर दिया है और देर सवेर यह सबकुछ काॅग्रेस द्वारा किया जाना भी निश्चित दिखाई देता है। हालातो के मद्देनजर यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय राजनैतिक दलो के बड़े नेताओं द्वारा अपनी अगली पीढ़ी को सत्ता की कमान सौपने के इस सारे खेल में जमीनी कार्यकर्ताओं के लिऐ कोई भी जगह दोनो ही राष्ट्रीष्य राजनैतिक दलो में नही दिखाई देती। हालात यह इशारा भी कर रहे है कि तेजी से बदल रहे चुनावी समीकरणों के बीच से गायब होते दिख रहे स्थानीय मुद्दे तथा चुनाव लड़ने के लिऐ आवश्यक समझे जाने वाले धनबल की कमी के चलते जनसरोकारों की बात करने वाले लोग चुनाव मैदान से दूर होते जा रहे है तथा उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में भागीदारी या फिर पहाड़ से पलायन के मुद्दे जनचर्चाओं से दूर होते चले जा रहे है। इन हालातों में यह गम्भीर विचार-विमर्श का विषय हो सकता है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसा उत्तराखण्ड देने वाले है और एक पृथक प्रर्वतीय राज्य के रूप में हमारी प्राथमिकताऐं क्या है ?

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