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Friday, June 23, 2017

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एक बार फिर सड़को पर

तेज हो चुकी चुनावी जंग के बीच हरीश रावत ने कराया अपनी ताकत का अहसास

हाईटेक तकनीकी व संसाधनो की उपलब्धता के मामले में अव्वल नजर आ रही भाजपा ने लोकलुभावन नारो व जनसमस्याओं को मुद्दा बना जैसे ही प्रचार शुरू किया तो एकबारगी यह लगा कि पिछले तमाम मुख्यमंत्रियों व बागी विधायको के बूते सत्ता हथियाने की कुंजी तलाश रही भाजपा इस बार एक सुनियेाजित रणनीति के साथ मैदान में उतरी है लेकिन उम्मीदवारों का चयन और टिकट वितरण का दौर समाप्त होते-होते उसके तमाम बड़े नेता संगठनात्मक स्तर पर उठ रहे विरोध के सुरो को दबाने में कुछ इस तरह मशगूल हुऐ कि तेजी पकड़ता दिख रहा भाजपा का चुनाव प्रचार एक बार फिर ठण्डा पड़ता दिखा और इस सारी कशमकश के बीच भाजपाई हुऐ पूर्व मुख्यमंत्री व वयोवृद्ध काॅग्रेसी नेता प0 नारायण दत्त तिवारी भी कुछ इस तरह गायब हुऐ कि उनके भाजपाईकरण को लेकर उत्साहित नजर आ रहे बड़े नेताओ की सोच पर भी एक प्रश्न चिन्ह लगता दिखाई देने लगा। उम्मीद है कि भाजपा के भीतर चल रहा अन्र्तविरोध का दौर धीरे-धीरे कर थम जायेगा और बगावत की राह अख्तियार कर चुनाव मैदान में कूदे नेताओं को भी देर-सवेर मना लिया जायेगा लेकिन हालात यह इशारा कर रहे है कि इस सबके बावजूद भाजपा की राह अभी भी आसान नही है जबकि इस सबके बीच काॅग्रेस के एक मात्र स्टार प्रचारक हरीश रावत अपना झण्डा-डण्डा थामकर मैदान में उतर चुके है और उनके समर्थन मेें लग रहे नारे तथा उनके रोड शो के दोरान नजर आने वाला जनता का सेलाब यह अहसास करा रहा है कि सत्ता में तीन साल गुजारने के बावजूद स्थानीय जनता व कार्यकर्ताओ को उनसे उम्मीदें है। हाॅलाकि भाजपा के पास चुनाव मैदान में उतारे जाने के लिऐ बड़े नामो व पूर्व मुख्यमन्त्रियों की एक पूरी फौज है और भाजपा हाईकामान यह भी अच्छी तरह जानता है कि इस भीड़ में से कुछ नाम तो हरीश रावत से अपनी व्यक्तिगत् नाराजी के चलते भाजपा के फायदे का बड़ा सौदा हो सकते है लेकिन ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ जैसा सवाल भाजपा के इन तमाम नेताओ को मैदान मे उतरने से पहले ही डरा रहा है और काॅग्रेस से बगावत कर भाजपा में शामिल होकर मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे सतपाल महाराज अपने निर्वाचन क्षेत्र में ऐसे फंसे मालुम हो रहे है कि उनका अन्य विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार के लिऐ जा पाना असंभव नही तो मुश्किल जरूर जान पड़ रहा है। यह ठीक है कि इस प्रदेश की जनता ने अबतक हर आम चुनाव में मुख्य विपक्षी दल को ही सरकार बनाने का मौका दिया है और इतिहास इस बात का भी गवाह है कि सुशासन के नारे के साथ भाजपा का मुख्य चुनावी चेहरा बनकर ‘खंडूरी हुऐ जरूरी’ वाले अन्दाज में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री चुनाव मैदान में उतरे थे तो न सिर्फ उनकी पार्टी सरकार बनाने से महरूम रही थी बल्कि वह भी चुनाव हार गये थे लेकिन इस बार हालात बदले लगते है क्येाकि पिछले एक वर्ष में काॅग्रेस में मंचे घमासान के बाद काॅग्रेस का हर छोटा-बड़ा कार्यकर्ता यह तो मानता ही है कि इस बार काॅग्रेस के पास हरीश रावत के अलावा और कोई दूसरा चुनावी चेहरा नहीं है, उपरोक्त के अलावा सरकार की कार्यशैली में नजर आने वाली कई कमियों के बावजूद सरकार को लेकर जनता या कार्यकर्ता वर्ग में कोई विशेष नाराजी नही दिखाई देती क्योकि नाराज लाॅबी पहले ही काॅग्रेस छेाड़कर भाजपा के साथ शामिल होने का विकल्प आजमा चुकी है। इन हालातो में पूरे दम खम के साथ अपना चुनाव अभियान शुरू कर चुके हरीश रावत पहले ही झटके में भाजपा पर भारी पड़ते दिखाई देते है और बिना किसी विशेष तामझाम के चलता दिख रहा उनका यह चुनाव प्रचार अभियान लगभग हर विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं में नये प्राणों का संचार करता मालुम देता है। इसके ठीक विपरीत भाजपा जनता के बीच जाने के लिऐ तकनीकी के संसाधनों का भरोसा करती दिखाई देती है और फेसबुक, वर्डसअप, ट्वीटर या सोशल मीडिया के अन्य समूहो पर जमे उसके समर्थक आधी-अधूरी जानकारी व मोदी के प्रति पूर्ण समर्पण को आधार बनाकर चुनावी ऐजेण्डा जनता के बीच पहुॅचाने में सक्रिय दिखाई दे रहे है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि पंजाब में चुनावी दौड़ से बाहर होने के बाद उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश के चुनावों में अपनी राजनैतिक पकड़ बनाये रखने के लिऐ भाजपा के कार्यकर्ता बने गणवेशधारी इस बार भी धार्मिक मुद्दो को आधार बनाते हुऐ मतदाताओं के एक वर्ग को अपनी ओर आकृर्षित करने का प्रयास करे तथा इस खेल में कुछ ऐसे चेहरे भी भाजपा के सारथी बने नजर आये जिन्हे अपनी रोजी रोटी चलाने के लिऐ हमेशा से ही इस तरह के मुद्दो की तलाश रहती है लेकिन यह तय है कि उत्तराखण्ड के एक बड़े हिस्से में भाजपा की यह रणनीति कामयाब नही होगी और सिर्फ चुनावी जीत के लिए जनता के दिलो को बाॅटना भाजपा के लिऐ आसान नही होगा। दल-बदल के मामले मंे एक बार पहले ही हरीश रावत से मात खा चुके भाजपा के बड़े नेता चाहते थे कि हरीश रावत को सीबीआई के फेर में उलझाकर उनकी चुनावी सक्रियता से रोका जाय ताकि वह कॅाग्रेस की बची-खुची ताकत को एकजुट कर हमलावर होने में कामयाब न हो सके लेकिन बाजरिया न्यायालय हरीश रावत ने एक बार फिर भाजपा हाईकामन के शीर्ष नेतृत्व को इस मुद्दे पर मात दी और अब हरीश रावत एक बार फिर अपने ही अन्दाज में जनता के बीच दिखाई दे रहे है। मजे की बात यह है कि उनके पास जनता के तमाम सवालो के जबाव है और वह तैश में आये बिना मीडिया के हर सवाल का जबाव दे रहे है जबकि भाजपा के कार्यकर्ताओं की मजबूरी है कि दागी और बागी पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले जनता अथवा मीडिया के किसी भी प्रश्न को वह अनसुना करें या फिर इस तरह के सवालों को उठाने वालो को देश द्रोही का तमगा देते हुऐ मोदी की जय जयकार का नारा लगाये। यह तो वक्त ही बतायेगा कि उत्तराखण्ड में तेज हो चुकी इस चुनावी जंग को लेकर जनता क्या फैसला लेती है और बाजरिया बगावत चुनाव मैदान में उतरे काॅग्रेस व भाजपा के सभी सम्भावित दावेदार आगे क्या गुल खिलाते है लेकिन एक जननेता के रूप में हरीश रावत के जनता के बीच जाने के अन्दाज तथा रोड शो के माध्यम से उनके अपनी ताकत का अहसास कराने के तरीके मात्र से यह अन्दाजा हो गया कि आगे-आगे यह चुनावी जंग दिलचस्प मोड़ लेने वाली है।

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