बगावत के बाद | Jokhim News

Friday, July 21, 2017

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बगावत के बाद

निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में ज्यादा मजबूत दिखाई दे रहे है आर्येन्द्र शर्मा।

हालांकि किसी भी राजनैतिक दल या राजनेता के फैसले को गलत अथवा सही कहने का हमें अधिकार नही है और न ही राजनीति के दिग्गज खिलाड़ियों द्वारा हमारी सलाह या खबरों के आधार पर अपना फैसला जाता है लेकिन देहरादून की सहसपुर विधानसभा के परिपेक्ष्य में सत्ता पक्ष द्वारा लिये गये फैसले पर गौर करें तो ऐसा मालुम होता है कि कांग्रेस ने सबकुछ जानबूझकर भी अपने एक बड़े व युवा नेता को दंाव पर लगा दिया है। नामांकन के दौरान आर्येन्द्र शर्मा के पक्ष में खड़ी नजर आ रही भीड़ व उनके नामांकन जुलूस को देखकर तो पहली नजर में यह अंदाजा आता है कि जनता की संवेदनाएं इस बार आर्येन्द्र से जुड़ी हो सकती है और उनके निर्दलीय रूप से मैदान में उतरने के फैसले के बाद जनता तमाम जातीय और सामाजिक समीकरणों को एक तरफ रखकर उनके पक्ष में मतदान कर सकती है। यूं तो पिछली बार भी आर्येन्द्र की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी और उनके समर्थक उन्हें विधायक का नही मुख्यमंत्री पद का दावेदार मानकर चल रहे थे लेकिन यहीं अति विश्वास उनकी हार का कारण बना और स्थानीय स्तर पर यह माना गया कि आर्येन्द्र चुनाव हारे नही बल्कि उन्हें हराया गया। इस चुनाव के बाद उनके मुकाबले में उतारे गये एक मुस्लिम प्रत्याशी के चुनावी खर्च और बाद के वर्षों में मुख्यमंत्री के दरबार में उसे मिली विशेष जगह स्थानीय जनता की बीच जनचर्चाओं का बड़ा कारण रही लेकिन आर्येन्द्र इस सबसे दूर अपने जमीनी सम्पर्कों को मजबूत करने में लगे रहे और उनकी कार्य पद्धति देखकर स्थानीय जनता का यह विश्वास बढ़ा कि आर्येन्द्र शर्मा में वाकई वह तमाम खूबी है जो एक सच्चे जनप्रतिनिधि में होनी चाहिऐ। यह माना जा रहा था कि कांग्रेस इस बार भी आर्येन्द्र को ही अपना प्रत्याशी घोषित करेगी और छुटपुट विरोध के बाद उन्हें एक सर्वमान्य दावेदार स्वीकार करते हुये कांग्रेस के बैनर तले चुनाव लड़ाया जायेगा लेकिन परिस्थितियों में एकाएक ही बदलाव आया और संगठन नेे आर्येन्द्र शर्मा के स्थान पर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय को सहसपुर से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। शुरूवाती दौर में यह माना गया कि किशोर उपाध्याय के बड़े पद व उन्हें मिल रहे मुख्यमंत्री आवास के समर्थन के आगे तमाम बगावती सुर मंद नजर आयेंगे लेकिन पार्टी हाईकमान के इस फैसले के खिलाफ कांग्रेस भवन में जो नजारा देखने को मिला उससे यह स्पष्ट हो गया कि जनभावनाओं को अनदेखा करना आर्येन्द्र के लिऐ भी आसान नही होगा और न ही मतदाताओं को जातिगत् अथवा धार्मिक आधार पर बांटना इस बार संभव हो पायेगा हांलाकि भाजपा के लोग यह मानकर चल रहे है कि इस बार भी कांग्रेसी विचारधारा के दो प्रत्याशी मैदान में होने के चलते चुनाव को जीतना उनके लिऐ ज्यादा कठिन नही होगा लेकिन हालात यह इशारा कर रहे है कि चुनाव अभियान के प्रारम्भिक दौर में आर्येन्द्र को जनता के हर वर्ग का समर्थन मिल रहा है और कांग्रेस द्वारा ऐन मौके पर टिकट न दिये जाने के कारण जन संवेदनाऐं भी उनके साथ है। अगर जनता के बीच यहीं माहौल कायम रहा तो इस बार कई चैंकाने वाले नतीजे सामने आ सकते है और आर्येन्द्र के पीछे मजबूती से खड़ी दिखाई दे रही उनके समर्थकों की भीड़ को देखते हुऐ यह अंदाजा लगाया जाना मुश्किल नही है कि आर्येन्द्र का इसी अंदाज मेें मैदान में जमे रहना इस क्षेत्र के तमाम समीकरणों को बदल सकता है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि जातीय समीकरणों व भौगोलिक परिस्थितियों के हिसाब से अपने आस-पास की कई विधानसभी सीटो को प्रभावित करने में सक्षम सहसपुर की स्थानीय राजनीति में देहरादून के बड़े नेताओं व ख्ुाद को जनमत के सौदागर कहने वाले दलालों का कोई असर नही है और न ही क्षेत्र की स्थानीय जनता को बड़े -बड़े चुनावी वादो से बहलाया जा सकता है लेकिन इस तथ्य को भी नकारा नही जा सकता कि आर्येन्द्र शर्मा ने किसी महत्वपूर्ण पद में रहे बिना भी इस क्षेत्र के विकास को मद्देनजर रखते हुये कई काम किये है और इन पिछले पांच वर्षों में स्थानीय जनता ने उनकी कार्यक्षमता व कार्यशैली को भली-भांति पहँचाना है। इन तमाम परिस्थितियों में यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि आर्येन्द्र शर्मा इस चुनाव में भी एक मजबूत प्रत्याशी के रूप में आम जनता के बीच है और कांग्र्रेस से ठुकराये जाने के बाद उनकी जनस्वीकार्यता ज्यादा बढ़ी हुई नजर आ रही है। अब देखना यह है कि आर्येन्द्र अपनी इस बढ़त को बनाये रखने तथा अपने समर्थकों को मतदान केन्द्र तक ले जाने में किस हद तक कामयाब रहते है और उन की इस बगावत का सहसपुर के आसपास वाले विधानसभा क्षेत्रों पर क्या फर्क पड़ता है।

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