Saturday, April 29, 2017

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सब कुछ बदल डालने की ज़िद में

सत्ता परिवर्तन और जुमलेबाज़ी तक सीमित रह गया है लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के सम्मान का मुद्दा

चुनावी थुक्काफजीहत व जिन्दाबाद-मुर्दाबाद के नारो के बीच लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं पर आम आदमी की कब्जेदारी का अहसास कराता गणतन्त्र दिवस का राष्ट्रीय पर्व आ पहुॅचा है और लोकतन्त्र के पहरूऐं होने के दम्भ के साथ सत्ता पर काबिज या फिर इस कब्जे के लिऐ प्रयासरत् राजनैतिक चेहरे अपने-अपने अन्दाज में इसका यशोगान करते हुऐ मतदाताओं को रिझाने में मशगूल नजर आ रहे है लेकिन कोई भी नेता या राजनैतिक दल यह नहीं जानना चाहता कि आखिर मतदाता चाहता क्या है। देश की आजादी के वक्त जोश और राष्ट्रभावना से लबलेज राष्ट्र के नीतिनिर्माताओं ने यह सोचा भी नही होगा कि जनतन्त्र को ताकत देने के लिऐ उनके द्वारा किये जा रहे तमाम प्रावधान कालान्तर में कमजोरी में तब्दील हो जायेंगे तथा सरकार बनाने व सत्ता के शीर्ष पर कब्जेदारी करने की जल्दबाजी में नियमों, कानूनों व संविधान की धाराओं को इस कदर तोड़ा-मरोड़ा जायेगा कि जनहितकारी सरकार गठन के मामले में मतदाता की इच्छा के सम्मान का जुमला एक मजाक बनकर रह जायेगा। हाॅलाकि इन पैसठ-सत्तर सालो में संविधान में जुड़ी कई उपधाराओं व विधेयको के बावजूद संविधान की मूलभावना से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है और न ही मतदाता के अधिकार या उसे मिली संवैधानिक ताकतों में कोई तब्दीली की गयी है लेकिन इस सबके बावजूद लोकतान्त्रिक व्यवस्था के इस चुनावी खेल में मतदाता की ताकत कम हुई है और एक नेता, जनप्रतिनिधि या फिर सरकार में बैठा कोई बड़ा ओहदेदार ‘जनता के मन की बात‘ को सुनने व तवज्जों देने के स्थान पर उस पर अपने ‘मन की बात‘ थोपने पर ज्यादा यकीन करने लगा है। हो सकता है कि विचारधारा के नाम पर लड़ी जा रही तथाकथित राष्ट्रहित की इस लड़ाई में आम सहमति या सबको साथ लेकर चलने की जरूरत न महसूस की जा रही हो और एक लंबे इंतजार के बाद पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता के शीर्ष पर पहुँची राजनैतिक ताकतो को यह लगता हो कि अपने इस कार्यकाल में विपक्ष के समक्ष खींची गयी लंबी लाईन के बाद उन्हें जनआंकाक्षाओं व जनअपेक्षाओं जैसे मुद्दो पर कुछ कहने की जरूरत महसूस नही होगी लेकिन हालात यह इशारा कर रहे है कि कार्यशैली के बूते और जनभावनाओं के अनुरूप काम कर व्यवस्था का हिस्सा बने रहने की जगह सामने वाली लकीर को ही खत्म कर खुद को बड़ा साबित करने की एक जंग शुरू हो गयी है तथा ऐसा मालुम देता है कि इस सारी जद्दोजहद में जनसामान्य की भावनाओ या संवेदनाओं को ताक पर रख दिया गया है। यह ठीक है कि नये लोगों व नये राजनैतिक दलों को भी सत्ता में आने का हक है तथा एक लंबे समय तक एक ही विचारधारा के लोगों के सत्ता पर काबिज होने के चलते व्यवस्थाओं व जनसामान्य की सोच में भी कुछ खामियों आयी है लेकिन सवाल यह है कि बदलाव लाने के नाम पर आप करना क्या चाहते है या फिर आपका अपना ऐजेण्डा क्या है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के अन्र्तगत् सत्ता परिवर्तन का अधिकार मतदाता के रूप में जनसामान्य के पास है और देश की जनता ने समय -समय पर अपनी ताकत का अहसास करते हुये विभिन्न राज्य अथवा केन्द्र सरकारों के खिलाफ जनादेश दिये भी है लेकिन एक ढर्रे पर चल रही हमारे देश की राजनीति पर दशकों से कुछ परिवारों व उनके वंशजों का कब्जा बना हुआ है। सत्ता हासिल करने के बाद समूल परिवर्तन के नाम पर विपक्ष को खत्म कर देने की जिद के साथ राजनीति में जमे जमाये कुछ चेहरों को इधर से उधर करने से जनसामान्य को क्या हासिल होगा और विकास के नाम पर सिर्फ भाषणो की लफ्फेबाजी या फिर जोर-जबरदस्ती थोपी जा रही तथाकथित राष्ट्रवाद की विचारधारा से मजदूर और मजलूम का पेट कैसे भरा जा सकेगा, यह बताने के लिऐ कोई तैयार नही है। ऐसा नही है कि पहले सबकुछ ठीकठाक चल रहा था और अब एकाएक ही सत्ता के शीर्ष पर आये बदलाव ने सबकुछ बदल कर रख दिया लेकिन इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि बदलाव की जरूरत ही तब महसूस हुई जब पहले भी सबकुछ ठीक नही था और अब गलत को ठीक करने या फिर जनकल्याण की राह सुझाने के स्थान पर बार-बार पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा की गयी गलतियों का उलाहना देने का अन्दाज ज्यादा देर नही चल सकता और न ही ज्यादा लम्बे समय तक जनता को भाषणो व नारो के जरियें बहलाया जा सकता है। हमे यह ध्यान रखना होगा कि लोकतन्त्र में नेता और आदर्श चुनने की जिम्मेदारी जनता की है और चुने जाने के बाद जनाकाक्षाओं पर खरा उतरना व अन्तिम पंक्ती के जरूरतमन्द तक उसके अधिकार पहुॅचाना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन आज सत्ता पर कब्जेदारी के चक्कर में कुछ लोग जनता के तमाम अधिकार छीन लेना चाहते है और एक कार्पोरेट कम्पनी या ठेकेदार वाले अन्दाज में जनता को बाध्य किया जा रहा है कि वह मन अथवा बेमन से उन तमाम फैसलो का समर्थन करंे जो तथाकथित रूप से पूर्ण बहुमत वाली सरकार और विपक्ष मुक्त भारत का नारा देने वाले राजनैतिक दल के नेताओं द्वारा लिये गये है। गौर से देखा जाय तो इसे लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं पर कब्जेदारी के मामले की तरह देखा जा सकता है तथा सत्ता पक्ष की कथनी व करनी के बीच स्पष्ट नजर आ रहा फर्क यह इशारा भी करता है कि सरकार चलाने के नाम पर सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग के मामले में भी मौजूदा पक्ष कोई कसर नही छोड़ना चाहता। इन हालातों में जनता के बीच से जनता नेतृत्व चुने जाने या फिर जनमत का सम्मान करते हुऐ लोकतान्त्रिक सरकारों की स्थापना के लिऐ प्रतिबद्ध होने जैसी भाषाई कलाबाजी के इस्तेमाल से हमारा लोकतन्त्र कैसे मजबूत हो सकता है और संवेधानिक सरकार की स्थापना के नियमो व आदर्शो को याद करने भर से किस तरह गणतन्त्र को मजबूत किया जा सकता है, यह एक विचारणीय प्रश्न है।

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