Saturday, March 25, 2017

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सत्ता पर कब्जेदारी के खेल में।

लगातार बढ़ती नजर आ रही है यशपाल आर्या की राजनैतिक मुश्किले।
ठीक चुनावी मौके पर काॅग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुऐ यशपाल आर्या को नजदीक से जानने वाले लोग कुछ ही अरसा पहले तक उन्हे एक सज्जन व्यक्तित्व व राजनीति में काफी आगे तक जाने वाला लम्बी रेस का घोड़ा बताते थे और उनकी सादगी व विनम्रता की गारण्टी लेने वालो की भी एक लम्बी फेहिस्त कुॅमाऊ मेें दिखाई देती थी लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षो में यशपाल आर्या ने खुद ही अपनी छवि को तोड़ा और एक मन्त्री के रूप में अपने इस कार्यकाल में वह इस कदर बदले-बदले नजर आये कि उनके कई निकटवर्ती साथियों ने उनसे एक निश्चित दूरी बनाये रखना या फिर नये साथियों को तलाश करना ज्यादा उचित समझा। अपने राजनैतिक जीवन में सितार गंज, नैनीताल व बाजपुर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके यशपाल आर्या के तमाम नये पुराने निर्वाचन क्षेत्रो व चुनावी जीत के आकड़ो पर एक नजर डाले तो यह स्पष्ट दिखता है कि मृदुभाषी यशपाल आर्या को स्थानीय जनता ने हमेशा हाथोहाथ लिया और सबको साथ लेकर चलने में माहिर माने जाने यशपाल आर्या ने अपनी चुनावी जीत के लिए कभी किसी वर्ग या जाति विशेष की राजनीति भी नही की लेकिन इधर एक मन्त्री के रूप में यशपाल न सिर्फ खुद को एक दलित नेता के रूप में स्थापित करने के प्रयास में दिखे बल्कि अगर उनके जानकारों की बातों पर यकीन करें तो पुत्र के राजनैतिक सहयोगी के रूप में आगे आने के बाद ऐसा प्रतीत होने लगा कि मानो यशपाल आर्या के लिए सम्बन्धों से कहीं ज्यादा पैसा अहमियत रखने लगा हो। हो सकता है कि प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपने लम्बे कार्यकाल के दौरान सामने आने वाली राजनैतिक दुश्वारियों या फिर अपने राजनैतिक गुरू कहें जा सकने वाले प0 नारायण दत्त तिवारी के अघोषित राजनैतिक वनवास के बाद उन्हे यह अहसास हुआ हो कि राजनीति की बिसात पर तेजी से आगे बढ़ने के लिए पैसा महत्वपूर्ण है और व्यवसायिक पाठ्यक्रम से शिक्षित अपने एकमात्र पुत्र के राजनीति में उतरने के फैसले के बाद उन्हे अपनी आदतों व व्यवहार में बदलाव लाने के लिए मजबूर होना पड़ा हो लेकिन इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि उनका एकाएक ही यों भाजपा में जाना उनके अधिकाॅश सहयोगियो व विरोधियों को रास नही आया है और शायद यहीं वजह भी है कि काॅग्रेस में बढ़े कद के नेता माने जाने वाले यशपाल आर्या के साथ भाजपा में जाने वाले उनके निकटवर्ती सहयोगियों व काॅग्रेस कार्यकर्ताओं की सूची बहुत छोटी है। हाॅलाकि राजनैतिक दृष्टि से यशपाल आर्या का भाजपा में जाना उनसे पूर्व काॅग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वाले तमाम बागियों से ज्यादा फायदेमन्द माना जा सकता है क्योकि काॅग्रेस में पहले हुई बगावत के बाद यशपाल आर्या ने अपने पुत्र समेत न सिर्फ सत्ता के मजे लिये है बल्कि इन नेताओ की पूरी सूची में सिर्फ वहीं एक अकेले ऐसे नाम है जो भाजपा से एक साथ दो टिकट झटकनेेें में कामयाब रहे हैं लेकिन उनकी यह कामयाबी उनकी जिम्मेदारी भी बढा़ती है और राज्य की राजनीति के तेजी से बदल रहे हालात व भाजपा के बागी प्रत्याशियों के तेवर यह इशारा कर रहे है कि अगर यशपाल बाजपुर सीट पर पूरा फोकस करना छोड़कर पुत्र मोह में नैनीताल विधानसभा के भी दौरे करते है तो यह फैसला उन्हें भी मुश्किल में डाल सकता है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि नैनीताल विधानसभा क्षेत्र के बेतालघाट इलाके में यशपाल आर्या की अच्छी घुसपैठ रही है और व्यक्तित्व के धनी यशपाल आर्या में वह कुब्बत भी है कि वह इस क्षेत्र का सघन दौरा कर अपने साथ पुराने जुड़े लोगो को अपने पुत्र संजीव आर्या के समर्थन् में कार्य करने के लिए मना सके लेकिन बाजपुर में सुनीता बाजवा को प्रत्याशी बनाये जाने की खबरो के बाद उनका इस तरह अपने विधानसभा क्षेत्र को छोड़कर निकलना आसान नही होगा। बाजपुर विधानसभा क्षेत्र से सुनीता बाजवा को प्रत्याशी बनाये जाने की पैरोकारी करने वाले शर्मा बन्धुओ का बाजपुर की राजनीति व मतदाताओ के बीच ठीक-ठाक दखल रहा है तथा इस गुट का राजनैतिक विरोधी माना जाने वाला बाजपुर के पूर्व विधायक व भाजपा नेता अरविन्द पाण्डे का गुट भी इस बार यशपाल को विधानसभा पहुॅचने देने के मूड में नही दिखाई देता। यह ठीक है कि अरविन्द अपनी चुनावी तैयारी में गदरपुर में ही व्यस्त होने के चलते बाजपुर के चुनावी समीकरणों में बहुत ज्यादा उलटफेर करने की स्थिति में नही है लेकिन सुनीता टमटा बाजवा का पूर्व में पहाड़ी मूल से होने के साथ ही साथ भाजपा का सक्रिय कार्यकर्ता होना और भाजपा के एक बड़े नेता का नजदीकी रिश्तेदार हेाना उनके पक्ष में बताया जा रहा है। हाॅलाकि अभी मतदान में थोड़ा वक्त है और लम्बे राजनैतिक अनुभव व सियासी दावपेंचों के धनी माने जाने वाले यशपाल आर्या की व्यवहार कुशलता को देखकर यह माना जा सकता है कि चुनाव मैदान में जाने से पूर्व वह भाजपा के तमाम गुटो के अलावा अपने पूर्व सहयोगियों को भी साधने का प्रयास करेंगे लेकिन अगर लड़ाई उसूलों या सिद्धान्तो की न होकर आर्थिक आय के संसाधनो पर कब्जेदारी व धन्धेबाजी पर ही अटक कर रह गयी तो यशपाल आर्या के लिए यह चुनाव मुश्किलो भरा हो सकता है क्योकि उधमसिंह नगर की राजनीति में स्थापित कई भाजपाई मगरमच्छ यह कदापि नहीं चाहेंगे कि पाॅच साल तक सत्ता की मौज लेने के बाद यशपाल जैसी बड़ी मछलियाॅ उनके हिस्से के समुद्र में अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर पाने के योग्य रहे और अगर यशपाल आर्या अपने पुत्र समेत इस चुनाव को हार जाते है तो उनके कई सपने चूर-चूर होने के साथ ही उनकी राजनैतिक मुश्किलें बढ़ सकती है क्योंकि हालिया दलबदल के बाद काॅग्रेस के कई बड़े व छुटभेय्यै नेता उन तमाम काम धन्धो पर निगाहें गढ़ाये बैठे है जो अभी तक यशपाल आर्या के सिर्फ एक इशारे पर हो जाते, बताये जा रहे है। खैर नतीजा जो भी हो लेकिन इतना तय है कि हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान यह मुकाबला दिलचस्प होने जा रहा है और हाल-फिलहाल के माहौल में किसी भी प्रत्याशी को लेकर नतीजों का पूर्वानुमान लगाना या फिर राजनैतिक समीकरणों का अंदाजा लगाना हमारे भी बूते से बाहर है।

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