Thursday, April 27, 2017

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बदलाव की कीमत पर।

समर्पित कार्यकर्ताओं व संगठन की अनदेखी ने बदलकर रख दिये आम चुनावों के मायने।

उत्तराखंड में तेजी से बदल रहे स्थानीय समीकरणों के बीच अभी यह अंदाजा लगाया जाना मुश्किल है कि आगामी विधानसभा चुनावों में हार-जीत का गणित क्या होगा या फिर किस संगठन को सरकार बनाने का मौका मिलेगा लेकिन टिकटों के बटवारें को लेकर स्थानीय स्तर पर हो रही थुक्काफजीहत तथा चुनावी संघर्ष को बहुकोणीय बनाने के लिये बेताब नजर आ रहे छोटे-छोटे व नये नामों वाले राजनैतिक दलों की बड़ी तादाद एवं बागियों के एक बड़ी संख्या में मैदान में उतरने की संभावना को देखकर ऐसा जरूर महसूस हो रहा है कि जल्द ही यह राजनैतिक मुकाबला दिलचस्प मोड़ा ले लेगा और सरकार के गठन व मंत्रीमण्डल के प्रारूप को लेकर कई तरह की घोषणाऐं व पूर्वानुमान प्रस्तुत करने वाले राजनैतिक पंडितों के तमाम आंकड़ें ध्वस्त नजर आयेंगे। यह ठीक है कि विधानसभा चुनावों की घोषणा से पूर्व ही तत्कालीन सर्वे के नाम पर कुछ प्रायोजित आंकड़े मीडिया के विभिन्न माध्यमों से जनता के बीच प्रस्तुत कर कुछ नेताओं व राजनैतिक दलों ने अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की थी और जनपक्ष के एक हिस्से ने इन आंकड़ों पर भरोसा करते हुये यह मान भी लिया था कि स्वाभाविक रूप से सत्तापक्ष के विरोध में दिखने वाला आक्रोश अगर मतदाताओं के माध्यम से चुनाव केन्द्रो तक पहुँचता है तो कुछ फेरबदल के बाद इन आंकड़ो पर विश्वास किया जा सकता है लेकिन चुनावी मोर्चाबंदी शुरू होने के तत्काल बाद से ही अपने सिपाहियों पर भरोसा करने की जगह भगोड़ो की फौज के बूते मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे राज्य के दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दलों की चुनावी रणनीति देखते हुये यह अहसास हो रहा है कि राज्य की सत्ता पर कब्जेदारी का दावा करने वाले इन दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व के पास या तो स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं का आभाव है या फिर इन्हें अपनी ताकत से ज्यादा दुश्मन की शोहरत पर भरोसा है। दोनों ही स्थितियों में यह स्पष्ट है कि जनता की नब्ज पहचानने का दावा करने वाले इन नेताओं को अपने कार्यकर्ताओं पर भरोसा नही है और सालोसाल तक महिला मोर्चा या युवा संगठन को एकता का नारा देने वाले यह तमाम बड़े नेता इस तथ्य से भली-भाॅति वाकिफ है कि व्यवसाय में तब्दील हो चुकी राजनीति के इस दौर में कार्यकर्ताओ के बूते सत्ता हासिल करने की सोच रखना या फिर सत्ता हासिल करने के बाद राजकाज में कार्यकताओ की भागीदारी की बात करना, दोनों ही बेमानी है। ऐसा नही है कि कार्यकर्ताओ के तुष्टीकरण अथवा सत्ता में भागीदारी के नाम पर राज्य की पूर्ववर्ती सरकारों ने सरकारी संसाधनो व सुविधाओ को तथाकथित कार्यकर्ताओ के बीच बाॅटने से परहेज किया है या फिर राज्य की गम्भीर आर्थिक स्थिति को देखते हुए सरकारें कार्यकर्ता वर्ग को संतुष्ट करने में असफल रही है बल्कि अगर लाल बत्तियों या दायित्वों के वितरण के लिहाज से देखे तो यह स्पष्ट दिखता है कि हर सरकार ने अपनी पूर्ववर्ती सरकारें की हदो से आगे बढ़ते हुऐ इस प्रकार के ओहदो व सुविधाओ का बंटवारा किया है लेकिन यह काबिलेगौर है कि बिना किसी नियम अथवा मानक के बंटी यह सुविधाऐं हर सरकार के लिऐ गले की हड्डी साबित हुई है तथा मेहनतकश व जमीन से जुड़े कार्यकर्ताओं को धकेलकर आगे बढ़ने व राजनीति में सफल होने के लिए सबकुछ स्वयं ही हासिल कर लेने की बढ़ती जा रही प्रवृत्ति ने हर नेता को शंकालु व मतलबपरस्त बना किया है। यह ठीक है कि सरकार में बैठे लोगो की भी अपनी सीमाऐं व मापदण्ड है तथा राजकाज चलाने की मजबूरी के चलते किसी भी सत्ता पक्ष या विपक्ष के लिए यह सम्भव नही है कि वह अपने कार्यकर्ताओं को पूर्ण रूप से सन्तुष्ट कर सके लेकिन यह भी सच है कि एक बार सत्ता के शीर्ष को हासिल करने में सफल हो जाने वाले राजनेता यह कदापि नही चाहता कि उसके क्षेत्र अथवा सरकार में उसका विकल्प पैदा हो और इस विकल्प को खत्म कर राजनीति में बने रहने की जिद में वह अपने क्षेत्र या दल में किसी भी नेता को उभरने नही देना चाहता। नतीजतन वह खुद ही अपनी जड़ो को कमजोर करने में जुट जाता है और मजबूत कार्यकर्ताओं के आभाव में चुनावी मौसम में प्रबन्धन व कार्यकर्ताओ की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए बाजार या फिर इंवेट मैनेजमेन्ट कम्पनियों पर भरोसा करना उसकी मजबूरी हो जाता है। यह अकारण नही है कि आज उत्तराखण्ड जैसे छोटे राज्य में सरकार में बने रहने की चाहत के चलते एक पक्ष के नेता दूसरे पक्ष की ओर दौड़ लगा रहे है और कल तक उन्हे गाली देने वाला विपक्ष भी बाॅहे फैलाकर इन नेताओ का स्वागत् करने को बेताव नजर आ रहा है। हकीकत यह है कि आधार विहीन हो चुके यह तमाम नेता अन्दर ही अन्दर इतने खोखले हो चुके है कि मतलब परस्ती ने इनके जमीर का कत्ल कर दिया है लेकिन सुख-सुविधाओ की होड़ और जन प्रतिनिधि के रूप में चाटुकारों से घिरे रहने की चाहत इन्हें मजबूर करती है कि यह चुनाव दर चुनाव झूठे वादो व मनगढ़न्त किस्सो के साथ आम जनता के बीच जाते रहे। ऐसा नही है कि स्थानीय जनता इन तमाम तथ्यों को नही समझती और चुनाव दर चुनाव कुछ चुनिन्दा चेहरो को चुनकर भेजने के बावजूद उसे अपने साथ हो रही ठगी का अहसास नही होता लेकिन विकल्प के आभाव में नागनाथ या सापनाथ में से एक को चुनना जनता की मजबूरी है और खुद को लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं का खलीफा समझने वाले चन्द बड़े राजनैतिक दलो ने हमारी चुनाव व्यवस्था को कुछ इस तरह जकड़ लिया है कि बिना किसी लाग-लपेट के चलने वाले नौसिखियें युवा या फिर सिद्धान्तों
के सहारे चलने वाले आन्दोलनकारी संगठन इस व्यवस्था का हिस्सा बनने से पहले ही लड़खड़ा जाते हैं। यह ठीक है कि इन तमाम व्यवस्थाओं को एकदम से बदल पाना आसान नही है और न ही वर्तमान में जनता के पास वह ताकत बची है कि वह आन्दोलनों के बूते इन व्यवस्थाओं में बदलाव ला सके लेकिन आयाराम-गयाराम वाले राजनीति के इस दौर में यह भी तय है कि सत्ता परिवर्तन या बदलाव का जनसामान्य को कोई भी फायदा मिलना असम्भव है। इसलिऐ आइयें और मिल बैठकर विचार कीजिये कि चन्द चेहरो द्वारा सत्ता पर कब्जेदारी को लेकर लड़ी जा रही इस जंग के खिलाफ कैसे एकजुट हुआ जाये।

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