पुत्र मोह में तिवारी ने भी बदला खेमा | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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पुत्र मोह में तिवारी ने भी बदला खेमा

लाल टोपी त्याग कर भगवा धारण करने से नही रहा कोई परहेज ।

यशपाल आर्या के बाद पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के भी काॅग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने के बाद यह तय हो गया कि चार-चार पूर्व मुख्यमन्त्रियों को साथ लेकर चलने के बावजूद खुद को हरीश रावत के मुकाबले कमजोर मान रही भाजपा को अहसास है कि उसके सिपाही मजबूत नही है और शायद यहीं वजह है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए उत्तराखण्ड में काॅग्रेस के दागी व बागियों से काम चलाना चाहते है। हाॅलाकि उम्र के लिहाज से यह तय है कि नारायण दत्त तिवारी इस बार खुद चुनाव मैदान में नही उतरेंगे लेकिन वह जिसके साथ भी खड़े होंगे उनकी नेकनामी या बदनामी का पूरा फायदा उसे मिलेगा और माहौल यह इशारे कर रहा है कि अब भाजपा के पास पूर्ववर्ती काॅग्रेस सरकारों पर निशाना साधने के लिए सीमित ही मसाला बचा है जबकि बातों ही बातों में मुस्कुराकर बड़े तंज करने वाले हरीश रावत के लिए यह सुविधाजनक है कि वह अपनी या काॅग्रेस सरकार की हर नाकामी को आराम के साथ विपक्ष के मत्थे मढ़कर एक नये अध्याय की शुरूवात कर सकते है। यह ठीक है कि मुद्दों से दूर होते दिख रहे उत्तराखण्ड के विधानसभा चुनाव में पिछली सरकारों के कामकाज या फिर नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोंपों पर चर्चा होने की सम्भावना नगण्य है और स्थानीय स्तर पर मजबूत राजनैतिक विकल्प के आभाव में उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौरान उठने वाले सवालो पर चर्चा लगभग बन्द हो चुकी है लेकिन समस्याओं से ग्रस्त आम आदमी अपने नेताओं व तमाम पूर्व मुख्यमन्त्रियों से यह सवाल जरूर पूछ सकता है कि अपने शासन काल में उनकी सरकार की मुख्य उपलब्धियाॅ क्या रही है और यह तय है कि इस सवाल का जवाब देना भाजपा के नेताओं को भारी पड़ सकता है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि पूर्व मुख्यमंत्री प0 नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में उत्तराखण्ड राज्य की एक बेहतर बुनियाद रखी गयी थी और उनके प्रयासो से राज्य के तराई-भाॅवर क्षेत्र में लगे उद्योग धन्धो की वजह से स्थानीय आबादी के एक बड़े हिस्से को रोजगार मिला हुआ है लेकिन यह तमाम तथ्य वर्तमान में विधानसभा चुनावों को प्रभावित नही करते और न ही तिवारी वर्तमान में इस स्थिति में है कि कुॅमाऊ के तराई-भाॅवर वाले हिस्सें में किसी राजनैतिक दल या उम्मीदवार के लिए भागदौड़ कर सकें। वैसे भी पाॅच साल उत्तराखण्ड का मुख्यमंत्री रहने के बाद अघोषित् रूप से काॅग्रेस की राजनीति से सन्यास लेने पं0 नारायण दत्त तिवारी ने इन पिछले दस सालों में इतनी फजीहत झेली है कि उनके तमाम समर्थक उनसे किनारा कर चुके है जबकि आज उनके नाम का सहारा लेकर विधानसभा चुनावों की वैतरणी पार करने का ख्वाब संजों रही भाजपा के तमाम नेताओं ने तिवारी सरकार के कार्यकाल व उनपर लगे तमाम चारित्रिक आरोंपो को लेकर इतने जुमले बनाये है कि वर्तमान में भाजपा के लोगों के लिए उनसे पार पाना ही मुश्किल होगा। यह ठीक है कि रोहित शेखर तिवारी या उज्जवला तिवारी, प0 नारायण दत्त तिवारी के कानूनी वारिस है और पूरा हक है कि राजनीति के मैदान में वह अपने पिता या पति को उपलब्धियों की चर्चा करते हुए जनसामान्य का चुनावी समर्थन माॅगे लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं के लिए जनता को जवाब देना मुश्किल हो सकता है और यह मुश्किलें उस वक्त और भी बढ़ सकती है जब किसी सार्वजनिक मंच पर जनता की ओर से भाजपा के पूर्व व वर्तमान नेताओं पर सवाल उठाया जायेगा। खुद को उत्तराखण्ड की सत्ता का प्रबल दावेदार मान रही भाजपा, के समक्ष पहली चुनौती तो अपने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को एकजुट करने व उन्हे चुनावों में काम करने के लिए तैयार करने की होगी, क्योंकि हालात यह इशारा कर रहे है कि सत्तर विधानसभा क्षेत्रो में से लगभग अठारह-बीस सीटो पर दावेदारी कर रहे अन्य दलो के नेताओ को भाजपा का जमीनी कार्यकर्ता अभी बर्दास्त नहीं कर पा रहा और संगठन के खिलाफ बगावत कर चुनाव मैदान में उतरने को तैयार दिख रहे इन तमाम बागी प्रत्याशियों को स्थानीय स्तर पर भाजपा के कार्यकर्ताओं के अलावा काॅग्रेस के भी कुछ लोगों का सहयोग मिलता दिख रहा है। हाॅलाकि चुनावों को लेकर स्पष्ट समीकरण क्या होंगे, यह नाम वापसी के बाद ही तय हो सकेगा लेकिन माहौल देखकर यह अन्दाजा लगाया जा सकता है कि दल-बदल को अपने लिऐ बहुत ज्यादा फायदेमन्द मान रही भाजपा को एक बार फिर अपनी इस कारस्तानी का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। मोदी के नाम व केन्द्र सरकार की उपलब्धियों के दम पर राज्य के विधानसभा चुनावों में उतरने की तैयारी कर रहे भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने अभी तक अपने तमाम बड़े नेताओं व पूर्व मुख्यमन्त्रियों की किसी भी फैसले पर सहमति को आवश्यक नही समझा है और अगर पूर्व मुख्यमंत्री बी0 सी0 खंडूरी की बेटी को मिले एक विधानसभा क्षेत्र से दावेदारी करने के मौके को दरकिनार कर दिया जाय तो यह अन्दाजा स्पष्ट तौर पर लगाया जा सकता है कि टिकट बॅटवारे के मामले में इन नेताओ से कोई सलाह भी नही ली गयी है जबकि टिकट बॅटवारे के मामले में सतपाल महाराज को दी गयी विशेष तवज्जो तथा उनके इशारे पर तमाम बागियों समेत यशपाल आर्या व उनके पुत्र और अब प0ं नारायण दत्त तिवारी के परिजनो में से एक को उनके मुहमाॅगे निर्वाचन क्षेत्रो से प्रत्याशी बनाना जनता के बीच यह संकेत दे रहा है कि हो न हो महाराज भाजपा की ओर से मुख्चमंत्री के सशक्त चेहरे हो सकते है। हो सकता है कि इस तरह के संकेतो के माध्यम से सतपाल समर्थको के जोश में इजाफा होता दिख रहा हो और भाजपा के बड़े नेताओ को यह उम्मीद भी लग रही हो कि इन तमाम बड़े नामों को आगे कर वह नांमाकन प्रक्रिया पूरी होने से पहले-पहले और दो-एक जिताऊ प्रत्याशियों को भाजपा के पक्ष में लाकर खड़ा कर सकते है लेकिन अगर गौर से देखा जाय तो विचारधारा के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओ के बीच इस सबका अच्छा सन्देश नही जा रहा और विधानसभा चुनावों को लेकर स्पष्ट दिख रही भाजपा के कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों व स्थानीय नेताओ की बेरूखी को देखकर यह अन्दाजा लगाया जाना मुश्किल नही है कि अमित शाह को यह दाॅव भारी पड़ सकता हैं। खैर राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन नारायण दत्त तिवारी को लेकर घटित हुऐ इस ताजा घटनाक्रम से एक बार फिर यह साबित हो गया है कि भाजपा को भी अब वंशवाद की राजनीति से परहेज नही रह गया है।

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