उत्सवों के बीच | Jokhim News

Saturday, November 18, 2017

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उत्सवों के बीच

उत्सवों के बीच
समूचे उत्तराखंड में दिखायी दी मकर संक्राति (उत्तरायणी) की धूम ।
नये साल के पहले पखवाड़े का आगाज मकर सक्रांति के पावन पर्व से करते हुए हम यह अनुभव कर रहे है कि मानव जीवन को गतिमान बनाये रखने के लिए उत्साह व आयोजनों का क्या महत्व है और सर्दी के इस मौसम में पहाड़ों पर हो रहा हिमपात हमें यह अहसास करा रहा है कि एक बार फिर ऋतु परिवर्तन का समय नजदीक आ गया है। यह ठीक है कि देवभूमि उत्तराखण्ड में अब मंचीय हो चुके तीज-त्योहारो व सामूहिक आयोजनों में वह पहले वाला जोश नजर नही आता तथा अपने-अपने अहम् की संतुष्टि व राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के चलते गली-मोहल्लों के हिसाब से सजने वाले मंचो में जन सामान्य की कम होती जा रही भागीदारी यह इशारे भी करती है कि नई पीढ़ी के सोचने का तरीका व मनोरंजन का अंदाज बदल रहा है लेकिन इस सबके बावजूद हम यह कह सकते है कि इन अवसरों की ऐतिहासिकता व धार्मिक महत्व कतई कम नहीं हुआ है। हो सकता है कि नोटबन्दी की मार से त्रस्त आदमी या फिर रोजी-रोटी की तलाश में घर से दूर भटक रहा एक नौजवान अपनी व्यक्तिगत् समस्याओं व जीवन की आपाधापी के चलते इस तरह के अवसरों पर अपनी सहभागिता देने में असमर्थ नजर आता हो और स्थानीय स्तर पर स्वतः स्फूर्त तरीके से प्रदर्शन करते नजर आने वाले लोक कलाकारों के स्थान पर भुगतान के आधार पर प्रदर्शन करने वाली मंडलियों अथवा व्यवस्थित तरीके से सरकारी कायदे कानूनो पर चलने वाली सांस्कृतिक दलो ने ले लिया हो लेकिन इस तरह के आयोजनों का एक पक्ष अभी भी उजला दिखाई देता है और यह देखकर हर्ष मिश्रित प्रसन्नता होती है कि इस तरह के आयोजन अभी भी अपनी लीक से हटे नही है। यह एक सुखद अनुभूति का विषय हो सकता है कि उत्तरैणी जैसे तमाम अवसरों पर कानो में पड़ने वाली परम्परागत् लोकगीतो की धुन जाने अनजाने में कदमों को थिरकनें को मजबूर कर देती है और संगीत की दुनिया में आये व्यवसायिक परिवर्तन के बावजूद युवाओं की मदमस्त टोलियाॅ अपने-अपने अन्दाज व अपने-अपने संसाधनो की उपलब्धता को आधार बनाते हुए अपने-अपने स्तर पर लोककला व लोकगीतो के इस संगम को ऊचाईयाॅ देने की कोशिश कर रहे है। स्थानीय संगीत के साथ प्रयोगो का दौर जारी है और अच्छे व कर्णप्रिय संगीत को हर स्तर पर सराहा भी जा रहा है लेकिन सवाल यह है कि इन आयोजनों की उद्देश्य क्या है, कहीं हमारे यह आयोजन अपने मूल उद्देश्य से भटककर तिथि और मौके की विशेषता को समाप्त करने पर तो नही तुले हुए। राजनेताओ की शह पर गली-मोहल्ले तक सीमित होते चले जा रहे आयोजनों की गुणवत्ता तथा आयोजन के उद्देश्यों का जिक्र करने के स्थान पर नेताओ के महिमा मंडन पर दिया जाने वाला जोर, यह साबित करता है कि हम अपने तीज-त्योहारों को मनाने का अंदाज बदल रहे है और समाज में आ रहा यह बदलाव हमें सांस्कृतिक रूप से विकृत कर रहा है। वक्त बदलने के साथ ही साथ इस तरह के बदलावों से जूझना और फिर एक नई लीक स्थापित करना मानव समाज की परम्परा रही है और इन परम्पराओं के अनुपालन में हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम सामाजिक दिशा भ्रम की स्थितियों को नकारते हुऐ अपनी लोक कलाओं व लोकसंस्कृति को बचाकर परम्पराओं का निवर्हन करें।

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