तेरा जाना, बनके उम्मीदों का लुट जाना | Jokhim News

Friday, June 23, 2017

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तेरा जाना, बनके उम्मीदों का लुट जाना

यशपाल आर्या के भाजपा में शामिल होने के बाद प्रदेश में धूमिल हुई दलित मुख्यमंत्री बनने की सम्भावनाऐं।

काॅग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व वर्तमान सरकार के मंत्री यशपाल आर्या का ठीक चुनावी मौके पर भाजपा में शामिल होना एक बड़ी व काॅग्रेस को झटका देने वाली खबर है और इस तथ्य से भी इनकार नही किया जा सकता कि ऐन टिकट बॅटवारे के मौके पर यशपाल आर्या द्वारा उठाया गया यह कदम आगामी विधानसभा चुनावों में काॅग्रेस की स्थिति को कमजोर कर सकता है। हाॅलाकि भाजपा में शामिल होने के बाद यशपाल खुद को कितना स्वतन्त्र व दबाव मुक्त महसूस करेंगे और भाजपा की सरकार बनने की स्थिति में उनकी राजनैतिक हैसियत क्या होगी, यह अभी से कहा नही जा सकता लेकिन बीजेपी में बड़े नेताओ की ठीक-ठाक तादाद व संघ का प्रभावी कैडर यह इशारे करता है कि चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा में काॅग्रेस वाली स्थिति में आने के लिए उन्हें वक्त की दरकार होगी। यह ठीक है कि भाजपा के पास उत्तराखण्ड में दलित एवं अनुभवी चेहरे की कमी पहले से ही महसूस की जा रही थी और अजय टम्टा को केन्द्र में राज्य मन्त्री बनाये जाने के बावजूद ऐसा नही लग रहा था कि वह भारी संख्या में दलित मतदाताओं को अपने साथ जोड़कर चलने में सफल होगें। इधर दूसरी ओर काॅग्रेस के शासनकाल में उठे पदोन्नति पर आरक्षण के मुद्दे को लेकर दलित कर्मचारी संगठनों की लामबन्दी में सफल रहे यशपाल का राजनैतिक कद तेजी से बढ़ा था और हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने से पहले तक उन्होंने भी कॅाग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था लेकिन हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश सरकार में उनकी स्थिति कमजोर होने लगी थी तथा कई मौके पर यह स्पष्ट लगा था कि सरकार उनके स्थान पर प्रदीप टम्टा को दलित नेता के रूप में ज्यादा तवज्जों दे रही है। यशपाल ने तत्कालीन परिस्थितियों में अनेक बार हरीश रावत सरकार से सामजस्य स्थापित करने का प्रयास किया था और रूठने-मनाने के अनेक दौर चलने के बावजूद भी यह माना जा रहा था कि काॅग्रेस में अपनी मजबूत स्थिति को छोड़कर यशपाल आर्या भाजपा की ओर रूख नही करेंगे लेकिन इधर पिछले कुछ समय से काॅग्रेस की एक और कद्दावर नेत्री इन्दिरा ह्नदेश के साथ चल रहा उनका छत्तीस का आकड़ा तथा अपनी राजनैतिक हैसियत बढ़ाने के उद्देश्य से नैनीताल व उधमसिंह नगर की कुछ विधानसभा सीटो पर समानान्तर प्रत्याशी खड़ा करने का उनका दांव उनको भारी पड़ा और जिद के इस खेल की परणीति उनके काॅग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने व भाजपा में शामिल होने के रूप में सामने आयी। अब देखना यह है कि बाजपुर विधानसभा से दावेदारी के साथ ही साथ अपने पुत्र का नैनीताल विधानसभा से टिकट पक्का करने के बाद अपने ही गुट के माने जाने वाले लालकॅुआ विधानसभा क्षेत्र के दावेदार हरेन्द्र बोरा व कालाढूंगी विधानसभा से निर्दलीय चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे महेश शर्मा को लेकर उनका चुनावी रूख क्या रहता है और काॅग्रेस के दस बागी विधायको के बाद यशपाल आर्या के भी भाजपा में शामिल होने व प्रत्याशी घोषित किये जाने के बाद भाजपा के कर्मठ व पुराने कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया क्या होती है? वर्तमान हालातो की बात करे तो मौजूदा विधानसभा के चुनावों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानो कॅाग्रेस के दो गुट आमने-सामने आकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हो और भाजपा के कुछ बड़े नेता पीछे से इस गुटबाजी को हवा देने की कोशिशों में लगे हो। अगर याद करें तो इन हालातो की तुलना राजीव गाॅधी की मृत्यु के बाद गठित काॅग्रेस (टी) वाले दौर से की जा सकती है और सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा, यशपाल आर्या व सम्भवतः पुत्र के साथ नारायण दत्त तिवारी, के नेतृत्व में काॅग्रेस छोड़कर भाजपा की ओर रूख करने वाले इस गुट का हरीश रावत से पुराना बैर जगजाहिर माना जा सकता है। यशपाल आर्या द्वारा पार्टी छोड़ने के इस घटनाक्रम के बाद सतर्क नजर आ रही काॅग्रेस में नेता पुत्रों को चुनाव मैदान में उतारे जाने की कार्यवाही पर भी रोक लगने की सम्भावना बलवती दिखाई दे रही है और यह माना जा सकता है कि काॅग्रेस में आया यह संगठनात्मक परिवर्तन युवा कार्यकर्ताओं व जोशीले नेताओ को नये अवसर प्रदान कर सकता है। अब राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा तथा कल तक प्रदेश सरकार पर विभिन्न आरोप लगा रहे भाजपा के कार्यकर्ता वर्तमान काॅग्रेस सरकार के एक पूर्व मुख्यमंत्री, दो कबीना मन्त्रियों, अनेक विधायको व कद्दावर नेताओ के भाजपा में शामिल होने के बाद क्या रणनीति अपनाऐंगे, यह तो पता नही लेकिन इतना तय है कि राजनीति की इस उठापटक को उत्तराखण्ड के लिए अच्छे दिनो की संज्ञा नही दी जा सकती।

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