डर के आगे जीत है और डर के आगे हार | Jokhim News

Friday, August 18, 2017

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डर के आगे जीत है और डर के आगे हार

अवैध बस्तियों व गैरकानूनी तरीके से सरकारी जमीनों पर बसे लोगो के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने का फैसला देने वाले कानून द्वारा इन कब्जो के पीछे छिपे कारणो पर कोई टिप्पणी न करना आश्चर्यजनक।

सरकार की भूमि पर भूमिहीनों द्वारा कब्जा कर अवैध निर्माण करना तथा नेताओ की शह पर इन तमाम अवैध बस्तियेां को सरकारी सुविधाएँ प्रदान करना लोकतान्त्रिक भारत के लिए नया नही है और न ही इस देश की सरकारें यह जानने की कोशिश करती है कि सरकारी तन्त्र की नाक के नीचे खेले जाने वाले इस वैध-अवैध के कारोबार में कितना बड़ा भ्रष्टाचार छुपा है। नेताओ के इशारें पर चलने वाला कानून इस तरह के तमाम मामलों में अपने हिसाब से काम करता है और जब तक बहुत जरूरी नही होता तब तक इस तरह की बस्तियों को उजड़ने नही दिया जाता क्योंकि इस तरह की बस्तियों में रहने वाले लोग न सिर्फ चुनावों के मौसम में वोट-बैंक की तरह काम करते है बल्कि अधिकांश मामलों में यह भी देखा गया है कि उजाड़े जाने का डर इन बस्तीवासियों (जिसमें कि अधिकांश मेहनतकश लोग ही होते है) को मजबूर करता है कि वह अपने दैनिक खर्चें चलाने के अलावा अन्य कई तरह के लोगो व उनके परिजनों के खर्चें भी वहन करे। कहने का तात्पर्य यह है कि इस तरह की अवैध बस्तियाँ चन्द गरीबों व बेसहारा लोगो को छत का आसरा ही नही देती बल्कि कई सरकारी महकमों को आय के संसाधन व वकीलो, छुटभयें नेताओ या अन्य दलाल किस्म के लोगो को रोजी-रोटी भी उपलब्ध कराती है लेकिन इस सबके बावजूद न्यायालय के इशारे पर या फिर किन्ही अन्य कारणों से सरकारी तन्त्र की निगाहें इनकी ओर टेडी होती है तो अवैध कब्जे के लिए कुसूरवार सिर्फ और सिर्फ उस गरीब को माना जाता है जो दशकों से इन सरकारी जमीन पर अपना टीन-टेापड़ा डालकर रह रहा है। हाॅलाकि राजनीति से प्रेरित सरकारी तन्त्र समय-समय पर इन अवैध बस्तियों को वैध करने अथवा अन्यत्र स्थानान्तरित कर सरकारी खर्च से इनके पुर्नवास की बात तो करता है लेकिन अपना मकसद पूरा हेाने के बाद सरकारी तन्त्र को चलाने वाले तथाकथित जनप्रतिनिधि अपने वादो को भूल जाते है और व्यवस्था से टकराते हुए भय के साये में जीवन जीना इन बस्ती वालो की नियति बनकर रह जाता है। यह तथ्य कानूनन वाजिब हो सकता है कि इस तरह की जमीनो के स्वामित्व वाले तमाम सरकारी महकमें अपनी विभिन्न विभागीय परियोजनाओं को पूरा करने के लिए वर्षों से इस भूमि का कब्जा वापस पाने के लिए प्रयास कर रहे है तथा एक लम्बी जद्दोजहद के बाद न्यायालय के इशारे पर सरकारी तन्त्र को इन अवैध कब्जो से बेदखली के लिए सख्त कदम उठाने केा मजबूर होना पड़ा है लेकिन सवाल फिर भी अपनी जगह कायम है और कोई भी नेता, सरकारी हुक्मराॅन् या अदालत यह बताने को तैयार नही है कि इस तरह की गयी बेदखली की स्थिति में वह कहां जाये। इस तरह की समस्याओं को धार्मिक नजरिये से देखने वाले कुछ लोग मानते है कि अवैध कब्जों के चलते अस्तित्व में आने वाली इस तरह की बस्तियाँ जयाराम पेशा व अपराधियों की शरणागाह होती है तथा राजनैतिक महत्वकांक्षाओ के चलते बसायी गई इन बस्तियों में तुष्टीकरण से लेकर आंतकवाद तक हर तरह का अपराध पलता है लेकिन इस तथ्य से वह भी इंकार नही करते कि इन बस्तियों के बसने की असल जिम्मेदार स्थानीय राजनीति व सरकारी मशीनरी ही होती है और उजाड़े जाने की स्थिति में सरकार की गलत नीतियों का नतीजा सिर्फ इन बस्तियों के गरीब बासिन्दों ने भुगतना पड़ता है। हो सकता है कि इन बस्तियों को उजाड़े जाने के संदर्भ में आने वाला न्यायालय का फैसला व कानून का नजरिया बिल्कुल सही हो और देश की लगातार बढ़ रही जनसंख्या को देखते हुए किये जा रहे रेलवे स्टेशनों के आधुनिकरण व सड़को के चैड़ीकरण को ध्यान में रखते हुए इनका इनके मूलस्थान (कब्जा स्थल) से इन्हे उजाड़ा जाना जरूरी हो लेकिन भारत का स्थायी नागारिक होने व अपने जन्म के ही बाद से सरकार को विभिन्न प्रकार की कर राशि अदा करने के कारण इस वर्ग के भी कुछ हक होंगे और इनको संविधान के दायरे में मिलने वाले तमाम अधिकार सरकार चलाने वाले तन्त्र को मजबूर भी करते होंगे कि वह संकट की स्थिति में फंसे अपने इन नागरिकों की रिहायश समेत दैनिक जीवन यापन की तमाम समस्याओं को लेकर स्पष्ट नीति निर्देश जारी करे। अवैध बस्ती का निर्माण व कालान्तर में सरकार की जरूरतेा को देखते हुए इन बस्तियों को खाली कराये जाने का सिलसिला या फिर राजनैतिक तुष्टीकरण के लिए इन्हे वैध रूप देने की सरकारी कोशिश, किसी एक शहर, कस्बे या प्रदेश की समस्या नही है और न ही न्यायालय आदेशो की आड़ में कानून का डण्डा भाॅजकर इस तरह की समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। अगर सरकारी तन्त्र वाकई में यह चाहता है कि इस तरह की समस्याओं का सामना न करना पड़े तो उसे न सिर्फ अपनी परिसम्पतियों की रक्षा खुद करनी होगी बल्कि तत्कालीन अधिकारियों व जिम्मेदार पदो पर बैठे नौकरशाहो से यह पूछना होगा कि आखिर कैसे उनकी नाक के नीचे इतनी बड़ी तादाद में अवैध कब्जो व निर्माण को अंजाम दिया गया और किस तरह सम्बन्धित विभागो द्वारा विवादित जमीन पर सरकारी सुविधाऐं प्रदान की गयी। सरकार को चाहिएं कि वह अपने अधीनस्थों की जिम्मेदारी तय करे और पूर्व में की जा चुकी गलतियों के मामले में भूल सुधार करते हुए अपनी सम्पत्तियों की जवाबदेही भी तय करे लेकिन पूर्व से काबिज कब्जाधारकेा के साथ मानवीय संवेदना के दायरे में रह कर ही कार्यवाही की जाय तथा कब्जाधारको की बेदखली आवश्यक होने की स्थिति में उन्हें सम्मानजनक तरीके से अन्यत्र स्थानांतरित किया जाय। स्थानीय राजनैतिक समीकरण बदलने व एक स्थायी वोट बैंक हाथ से जाने की डर से कई जिम्मेदार लोग व छुटभयै नेता यह नही चाहते कि इस तरह की समस्याओं का कोई स्थानीय समाधान निकले और रोज-रोज की नारेबाजी या प्रदर्शनों का सिलसिला समाप्त हो लेकिन जनता से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपने तात्कालिक लाभ को देखने के स्थान पर इस समस्या के स्थायी समाधान की ओर बढ़ने की कोशिश करें और वार्ताओं व दया की अपील के जरिये सरकार व न्यायालय से वह सब कुछ हासिल कर लिया जाए जो कि सम्मानजनक जीवन यापन के लिए जरूरी है। यह ठीक है कि हल्द्वानी के गफूर बस्ती के मामले में ध्वस्तीकरण के आदेश जारी कर चुके उत्तराखण्ड के उच्च न्यायालय ने इन तमाम पहलुओ पर विचार करने के बाद ही स्थानीय नेताओ को इस मामले का राजनीतिकरण न करने की ताकीद देते हुए प्रशासन को निश्चित समयान्तराल में ध्वस्तीकरण के आदेशों पर अमल करने व जरूरत पड़ने पर केन्द्र से सुरक्षा बल मुहैया कराये जाने कि निर्देश दिये है लेकिन इस अदालत से उपर भी एक और अदालत है। हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि उस अदालत में हर गरीब व जरूरत मन्द की अपील सुनी जायेगी और गफूर बस्ती समेत ऐसी तमाम अन्य बस्तियों के बाशिन्दों को एक अंजाने डर व अनहोनी की आंशका से निजात मिलेगी।

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