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Thursday, August 24, 2017

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आगे-आगे देखिये होता है क्या

बिना किसी ऐजेण्डे के चुनावी मोर्चे पर जाने की तैयारी कर रहे है राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के पुरोधा

अपने गठन के सोलह साल बाद चैथे विधानसभा चुनाव के लिए तैयार दिखता उत्तराखण्ड ग्यारह मार्च को क्या कुछ चैंकाने वाले नतीजे देगा, कहा नहीं जा सकता और न ही किसी क्षेत्र विशेष को लेकर किसी की हार या जीत की गारन्टी ही ली जा सकती हैं, लेकिन हालातो के मद्देनजर यह जरूर कहा जा सकता हैं कि सरकार के गठन को लेकर मुख्य मुकाबला राष्ट्रीय राजनैतिक दल कांग्रेस व भाजपा के बीच ही होगा। हाॅलाकि उत्तराखण्ड क्रान्ति दल का एक खेमा काशी सिंह ऐरी के नेतृत्व में उतरकर कुछ नेताओं का जीत के समीकरण बनाने या बिगाड़ने की कोशिश में है और परिवर्तन पार्टी के पी0 सी0 तिवारी, स्वराज मंच की कमला पन्त, आन्दोलनकारी मंच के प्रभात ध्यानी व एकीकृत प्रत्याशी उतारने की बात कर रहे वामपंथी दलो समेत अनूप नौटियाल या आप आदमी पार्टी के विभिन्न घटको से जुड़े तमाम छोटे-बड़े नेता अपने-अपने स्तर पर राज्य में राजनैतिक परिवर्तन लाने की बात कर रहे है, लेकिन चुनावों को लेकर असली तस्वीर क्या होगी, इसका अन्दाजा विभिन्न राजनैतिक दलो द्वारा प्रत्याशी मैदान में उतारे जाने के बाद ही आ सकेगा। यह ठीक है कि पिछले लगभग हर चुनाव में अपने वजूद को साबित कर चुकी बसपा व यूपी की सत्ता पर कााबिज सपा इस बार भी अपने प्रत्याशियों के साथ मैदान में उतरेगी और अलग-अलग नामों से पंजीकृत कई छोटे-छोटे दल भी कुछ विधानसभा क्षेत्रो मे नेताओं के समीकरण बिगाड़ने की कोशिश करते नजर आयेंगे, लेकिन अभी इस बात का अन्दाजा लगाना मुश्किल है कि 2017 में गठित होने वाली उत्तराखण्ड की विधानसभा में निर्दलियों व क्षेत्रीय दलो के विधायको की संख्या व भूमिका क्या होगी? जहाॅ तक मुद्दो का सवाल है तो यह साफ दिखता हैं कि राज्य के गठन के वक्त ही प्रदेश में अन्तरिम सरकार बना चुकी भाजपा अथवा वर्तमान में सत्ता पर काबिज काॅग्रेस के पास इस पर्वतीय प्रदेश के विकास को लेकर कोई सोचा समझा ऐजेण्डा नही है और न ही यह दोनों दल अपने चुनावी मंचो से विकास के ऐजेण्डे पर बात करते ही दिखाई देते हैं लेकिन इस सबके बावजूद प्रदेश की जनता के समक्ष इनका कोई विकल्प नही हैं, क्योंकि स्थानीय मुद्दो व क्षेत्रीय हित की बात करने वाली विचारधारा के पास अपने जनाधार को बढ़ाने के लिए संसाधन नही है और छोटे-छोटे गुटो में बंटे तमाम क्षेत्रीय दलांओ के नेताओ की निजी महत्वकांक्षा चरम् पर हैं। एक लम्बे आन्दोलन के बाद अस्तित्व में आये उत्तरखण्ड राज्य में यूं तो राजनैतिक सेाच या नेताओ का आकाल नही है और न ही स्थानीय मुद्दा को लेकर उद्देलित रहने वाली जनता को लामबन्द किया जाना कठिन ही दिखता है, लेकिन चुनावी मौसम में जनमानस की सोच व मतदाता का रूझान एकाएक ही क्यों बदल जाता हैं, और उसे जमीनी संघर्ष करने वाले नेताआंे की जगह बाहर से आयातित व हवा-हवाई नेताओ पर कैसे विश्वास हो जाता है, यह एक शोध का विषय हो सकता है। अगर मुद्दों की बात करे तो शराब पहाड़ में राजनीति का एक प्रमुख मुद्दा हो सकता है लेकिन मजे की बात यह है कि यहाॅ चुनावी मौसम मे मतदाता को आकृर्षित करने के लिए तमाम छोटे-बड़े नेता न सिर्फ शराब की गंगा बहाते है बल्कि शराब के कारोबारि के आर्थिक योगदान के बिना इस चुनावी महासागर में उतरा प्रत्याशी खुद को आधा-अधूरा या असुरक्षित महसूस करता है। ठीक इसी प्रकार पलायन व रोजगार इस पहाड़ी प्रदेश के ऐसे दूसरे प्रमुख मुद्दे है जिनके चर्चा उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के दौर से वर्तमान तक लगातार होता रहा है लेकिन मजे की बात यह है कि सत्ता की राजनीति करने वाले राज्य की राजनीति के दोनों ही बड़े दल इन मुद्दो पर अभी तक अपनी कोई स्पष्ट नीति नही बना पाये है और न ही कोई स्थानीय जन संगठन अथवा मीडिया इन मुद्दो पर चुनावों के दौरान फोकस करता दिखाई देता हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो इस चुनाव को एक मुद्दा विहीन चुनाव कहा जा सकता है और अगर राजनैतिक दलों की रणनीति पर गौर करे तो सत्ता की दौड़ मे आगे बताये जा रहे दोनो ही राष्ट्रीय राजनैतिक दल अपनी-अपनी ओर से कुछ खास चेहरों को आगे कर चुनाव मैदान में उतरना चाहते है लेकिन सत्ता पर कब्जेदारी सुनिश्चित करने के लिए उन्हे अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रो में अलग-अलग समीकरणों के खाके पर फिर बैठने वाले प्रत्याशिय की तलाश है और इस तलाश ने इन राजनैतिक दलो में ‘आयाराम-गयाराम’ की परम्परा पर जोर देते हुए राजनैतिक दलो में सक्रिय कार्यकर्ता के मायने ही बदल दिये हैं। हम यह तो नही कहते कि इन पिछले सोलह वर्षो में जनता के बीच से चुने गये जनप्रतिनिधियों ने राज्य के विकास के लिए कोई काम नही किया है या फिर लोकतान्त्रिक तरीके से राज्य में गठित की गयी व्यापक जनहितकारी सरकारें अपने उद्देश्यों पर खरी नही उतरी है लेकिन राज्य के मौजूदा हालात यह इशारें तो करते ही है कि राज्य गठन के बाद बनने वाली सरकारों की प्राथमिकताए व जनहित के मायनें तेजी से बदले है और निजी स्वार्थो में डूबा मतदाता इतना अहमक हो गया है कि राज्य गठन के उद्देश्य ही बदलकर रह गये है। हांलाकि समाज में आये इस बदलाव के लिए कुछ हद तक पिछले दो ढाई दशकों से बह रही पूॅजीवाद की बयार को भी जिम्मेदार माना जा सकता है और संवैधानिक तरीके से हुए सरकारें के गठन के बावजूद दिखने वाले अनियोजित विकास के लिए नौकरशाही की मनमानी व आधे-अधूरे जनादेश को भी कसूरवार ठहराया जा सकता है लेकिन अगर राज्य आन्दोलन के दौरान दिखाई देने वाले जज्बे व जुनून की नजर से देखे तो यह साफ दिखाई देता है कि राज्य आन्दोलन के दौरान व उसके बाद जन सामान्य की नजरों में खरा उतरने से चूका आन्दोलनकारी नेतृत्व जनसामान्य की सोच में आये इस बदलाव का बड़ा कारण दिखाई देता है और अब आन्दोलन के दो-ढाई दशक बाद बूढ़े हो चुके नेताओं या तथाकथित राज्य आन्दोलनकारियों से निजी स्वार्थो से उपर उठकर कुछ करने की उम्मीद करना भी बेमानी है। हालातों को मद्देनजर राज्य की राजनैतिक सोच में बदलाव लाने की उम्मीद राज्य के स्थानीय युवा संगठनो व छात्र संघो से की जा सकती थी लेकिन अपना राजनैतिक जनाधार बढ़ाने के नाम पर स्थानीय युवाओं व छात्रो के बीच अपनी राजनैतिक शाखाऐं स्थापित करने वाले तमाम राष्ट्रीय राजनैतिक दल एक नई राजनैतिक सोच को जन्म देने के स्थान पर अपने पिछलग्गुओ के ऐसे समूह पैदा
करने पर जोर देते है जो चुनावी मौका पर अपने नेताओं की ही जिन्दाबाद-मुर्दाबाद करते नजर आयें और स्थानीय जन आन्दोलन के जरिये उभरने वाला नेतृत्व सही राजनैतिक मार्गदर्शन के आभाव में अपने समर्थकों व विचारधारा को ज्यादा समय तक सहेज कर नही रख पाता। नतीजतन चुनावी मौके पर चन्द वहीं दागी चेहरें अपने घिसे पिटे नारों व चिरकाल तक दोहराये जा सकने वाले चुनावी वादांे के साथ हमारे बीच होते है और हमारी मजबूरी होती है कि हम शातिर या तिकड़मी में से किसी एक को चुने। हांलाकि देश का कानून एवं व्यापक चुनाव सुधारें के तहत दी गयी सभी प्रत्याशियों को खारिज करने की सुविधा (नोटा) हमें यह अधिकार देती है कि हम खुद को गलत लगने वाले प्रत्याशी के पक्ष में मतदान न करते हुए भी लोकतन्त्र के इस पावन कर्म में भागीदारी करें लेकिन चुनावी जीत के लिए कुल मत प्रतिशत् का एक जरूरी हिस्सा हासिल करने के संदर्भ में कोई मानक स्थापित न होने के चलते किसी भी तिकड़मी या शातिर प्रत्याशी को इस व्यवस्था का कोई नुकसान होता नही दिखता। हो सकता है कि चुनावी मोर्चे पर उतरने की तैयारी कर रहे तमाम प्रत्याशी व उनके समर्थक हमारे इन विचारों से सहमत न हो और वह यह उम्मीद कर रहे हो कि हम अपनी कलम के माध्यम से किसी दल या नेता विशेष का महिमामण्डल करते हुए उसके पक्ष में चुनावी फिंजा बनाने का प्रयास करेंगे लेकिन लोकतन्त्र के इस पावन पर्व के संदर्भ मे हमारा स्पष्ट मानना है कि चुनावी मौसम में किसी भी प्रत्याशी को जाॅचे-परखे व जाने बिना सिर्फ नारो या जुमलो के आधार पर उसका पक्ष लेना संविधान की गरिमा के अनुकूल नही हैं। इसलिऐ ‘आगे-आगे देखियें होता है क्या‘ वाले अंदाज में हम चुनावी मोर्चे पर उतरने वाले तमाम प्रत्याशियों व भागीदारी करने वो राजनैतिक दलों पर नजर बनाये रखने की कोशिश करेंगे और हमारा प्रयास होगा कि हम सिर्फ चुनावी जीत के लिऐ की जाने वाली खोखली भाषणबाजी व व्यर्थ की नारेबाजी के फेर में पड़ने वाली जनता को उसके मत की कीमत समझा सकें।

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