Saturday, May 27, 2017

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ना काहू से दोंस्ती , नही किसी से बैर

सर्वे के नाम पर चुनावों से ठीक पहले प्रस्तुत किये जा रहे आॅकड़ो से मतदाता को नही किया जा सकता गुमराह।
पाॅच राज्यो में आदर्श चुनाव संहिता के लागू होते ही कयासो का दौर चल पड़ा हैं, और राजनीति के पंडित अपने-अपने आॅकलन व ज्ञान के आधार पर अगली सरकार को लेकर घोषणाऐं करने लगे हैं, लेकिन यह आॅकलन किन तथ्यों को आधार बनाकर किया गया हैं, और किस विधानसभा क्षेत्र से कौन-कौन सा सम्भावित प्रत्याशी दमदार है, यह बताने को कोई तैयार नहीं हैं। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि प्रायोजित से लगने वाले इन तमाम सर्वेक्षणों या आॅकलन में सामान्य मतदाता के रूझान का ध्यान नही रखा गया है, और न ही किसी राजनैतिक भविष्यवक्ता ने यह जानने की कोशिश ही की है कि जिन विधानसभा क्षेत्रो में विधायको की जीत-हार को मद्देनजर रखते हुए इस तरह की घोषणाऐं की जा रही है, वहाॅ की स्थानीय समस्याऐं व जनापेक्षाएं क्या हैं। ऐसा प्रतीत होता हैं कि बन्द कमरों में बैठकर मात्र आर्थिक प्रलोभनो के चलते जनता को भ्रमित करने के लिए सर्वे के नाम पर सार्वजनिक किये जा रहे यह आॅकड़े किसी राजनैतिक मुहिम अथवा सौदेबाजी का नतीजा हैं और आॅकड़ो के इस खेल के जरिये मतदाता व मतदान के प्रतिशत् को प्रभावित करने की कोशिश शुरू हो चुकी हैं। यह ठीक है कि सत्ता हासिल करने के लिए कुछ भी कर गुजरने की तैयार राजनैतिक दलो द्वारा पर्दे के पीछे से लड़े जाने वाले इस छद्म युद्ध को रोकने का कोई भी तरीका चुनाव आयोग अभी तक निश्चित नही कर पाया है और न ही व्यवसायिक मानसिकता के गुलाम हो चुके मीडिया के एक हिस्से को इस बात की परवाह है कि उसका छोटा लालच सारी की सारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को ही खतरें में डाल रहा हैं, लेकिन इस सबके बावजूद यह तथ्य काबिलेगौर है कि इस तरह का प्रायोजित प्रचार चुनाव नतीजो को प्रभावित करने में असफल दिखाई देता हैं, अैर मतदाताओं ने हर बार मतदान प्रभावित करने की इस तकनीक को खारिज ही किया हैं। हांलाकि चुनावो से पूर्व किये जाने वाले राजनैतिक विश्लेषण अथवा पाॅच साल तक सत्ता में रह चुके जन प्रतिनिधियो के कामकाज की समीक्षा किया जाना या फिर मतदाता को तार्किक आधार पर प्रत्याशी के चयन के लिए तैयार करना गलत नहीं है, बल्कि अगर सही मायने में देखा जाऐ तो इस तरह की स्वस्थ बहस से स्थानीय उम्मीदवारों को भली-भांति जानने और चुनाव मैदान में उतर रहे राजनैतिक दलो के असल ऐजेण्डे को पहचानने में मदद मिलती है, लेकिन अफसोसजनक पहलू यह है कि वर्तमान भागमभाग वाले दौर में खवर नवीस भी सच को जनता के सामने लाने की जिम्मेदारी से बचने लगे है या फिर उनकी आर्थिक मजबूरियों ने उन्हे इतना दयनीय बना दिया हैं कि सच का पोस्टामार्टम करने में उन्हें किसी दर्द का एहसास नही होता। यह ठीक है कि मीडिया के एक बड़़े हिस्से पर काबिज व्यावसायिक मानसिकता ने समाचारो के मायने और पत्रकारों की जिम्मेदारियाॅ बदल कर रख दी है तथा अपने संस्थान के प्रति जबावदेह पत्रकार की मजबूरी हो गयी है कि वह अपनी सेवाएं सुरक्षित रखने के लिए हर समाचार को अपने मालिको की नजर से देखे और उसमे अपना व संस्थान का आर्थिक हित देखने की कोशिश करे लेकिन चुनावी मौसम में इस तरह की कोशिशों के चलते कभी-कभी अर्थ का अनर्थ भी हो जाता हैं और ज्यादा आर्थिक अनुदान प्राप्त करने के चक्कर में इमेज बिल्डिंग का दावा करने वाले तथाकथित पत्रकार अपने निकटवर्तियो का बंटाधार ही कर देते हैं। ऐसा ही कुछ लोकसभा चुनाव के दौरान नरेन्द्र मोदी के साथ हो भी चुका है। मीडिया मेनेजमेन्ट व इमेज बिल्डिंग के सहारे लोकसभा चुनावों में जीत हासिल कर पूरे बहुमत के साथ सत्ता में आये मोदी को मीडिया का इस्तेमाल करने में महारत हासिल हैं और इसे उनके मीडिया मेनेजमेन्ट का ही कमाल कहा जा सकता हैं कि उनके विदेश दौरे हो या फिर आपदा की स्थिति में की गयी नेपाल जैसे मुल्क की सहायता, उनके हर फैसले व काम करने के तरीके को मीडिया के एक हिस्से द्वारा ठीक-ठाक तरीके से प्रायोजित किया गया हैं, लेकिन कालान्तर में जनता जब इस खेल को समझी है तो मोदी की विश्वसनीयता घटती हुई दिखाई दे रही हैं और सरकार द्वारा लिए गये नोटबन्दी के फैसले पर जनता उन तमाम बातो पर ऐतबार करने को तैयार ही नही है जो नोटबन्दी के समर्थन में कही गयी हैं। कितना दुखदायी विषय है कि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आये एक प्रधानमंत्री ने अपने ही देश की जनताको विश्वास में लेने के लिऐ मंचो से पचास दिन का समय माॅगते हुए यह कहना पड़ा है कि ‘‘ अगर पचास दिनो में हालात सामान्य नही होते तो फिर किसी भी चैराहे पर उन्हे सजा दी जा सकती हैं।‘‘ हांलकि एक राजनेता के तौर पर वह इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि इस देश की जनता चाहकर भी उन्हे पाॅच साल का कार्यकाल पूरा होने से पहले सत्ता से बेदखल नही कर सकती और रही सजा की बात तो जिस देश की सम्पूर्ण व्यवस्था राजनेतआों की वाकपटुता व राजनैतिक चतुराईयो के आगे बेबस नजर आती हो, उस देश की जनता की यह बिसात कहां कि वह अपने प्रधानमंत्री के लिए कोई सजा मुकर्रर कर उन्हे किसी चैराहे पर आमंत्रित कर सके लेकिन इस सबसे बावजूद जनता के बीच अपनी साख बचाये रखने के लिए देश के प्रधानमंत्री मोदी जी को एक बार फिर मीडिया का सहारा लेना पड़ा है और खाली नजर आ रहे एटीएम व बैंको में लगी लम्बी लाइनों का बावजूद यह खबर धड़ल्ले से चलाये जा रही हैं कि नोटबन्दी के मामले में अब हालात तेजी से सामान्य हो रहे हैं। इतना ही नही देश के वित्त मंत्री भी बासी आॅकड़ो केा सामने रखकर नोटबन्दी के असर को नकारने की कोशिश करते दिखाई देते हैं और कैशलेस के नाम पर जनसामान्य को एक अलग तरह के मायाजाल में उलझाने की कोशिश शुरू हो गयी हैं। यूं तो नोटबन्दी को लेकर ही कहने को बहुत कुछ है लेकिन अभी चर्चा छवि निर्माण तथा मीडिया मेनेजमेन्ट के बलबूते जनता केे सामने मनगणन्त आॅकड़े प्रस्तुत कर जनता के बीच माहौल बनाने के मुद्दे पर हो रही है और इस विषय में सिर्फ इतना ही कहना काफी हैं कि चुनावो के लिए तैयार इन तमाम राज्यों में अपनी पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान किसी भी तरह की विशेष उपलब्धि न दर्शा सकी भाजपा सिर्फ मोदी जी के नाम के सहारे इस चुनावी वैतरणी को पार करने की कोशिश कर रही हैं। यहाॅ पर यह कहने में भी कोई हर्ज नही दिखता कि कुछ बड़े मीडिया घरानो को सरकारी लाभ पहुॅचाने के लिए मध्यम व छोटे दर्जे के समाचार पत्रो का कत्ल करने का मन बना चुकी मोदी सरकार को अपने मीडियो मेनेजमेन्ट व सरकार द्वारा प्रदत्त आर्थिक अनुदानो पर पलने वाले चुनिन्दा मीडिया घरानो पर इतना विश्वास हैं कि उसे मोदी की छवि बनाकर रखने के लिए सम्पूर्ण भाजपा को दाॅव पर लगाने में कोई ऐतराज नहीं होता। शायद यहीं वजह है कि आज उत्तर प्रदेश, उत्तरखण्ड व पंजाब जैसे राज्यो में चुनावी नारो या चुनावी मंचो पर मोदी के अलावा कोई बड़ा नेता नजर नही आ रहा और न ही लम्बे समय तक लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओ को बन्दी बनाया जा सकता हैं।

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