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Monday, December 11, 2017

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राजनीति की बिसात पर

केन्द्र सरकार के खिलाफ धरने पर बैैठे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत

राजकाज से पहली फुर्सत पाते ही केन्द्र सरकार के खिलाफ धरना देने दिल्ली जा पहुंचे हरीश रावत हर मौके का इस्तेमाल करना अच्छी तरह जानते है और शायद यहीं वजह है कि लगभग तीन साल सत्ता में रहकर धमाल मचाने के बावजूद राज्य के प्रमुख विपक्षी दल भाजपा के पास उन्हें घेरने के लिऐ कोई मुद्दा नहीं है। कुर्सी संभालते ही धुँआधार पारी शुरू करने वाले हरीश रावत ने जब बिना रूके दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों के दौरे शुरू किये थे और अपने हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में घोषणाओं की झड़ी लगानी शुरू की थी तो यह अंदाजा आ गया था कि आगामी वर्षाें में भाजपा की मुसीबतें बढ़ सकती है लेकिन भाजपा हाईकमान ने उस वक्त संगठन की मजबूती पर ध्यान देने व एक सर्वमान्य नेता की खोज करने की जगह सरकार के कामकाज में टांग अड़ाना व आंकड़ों की बाजीगरी का सहारा लेकर सरकार गिराना ज्यादा जरूरी समझा। नतीजतन आज सत्ता पक्ष होते हुऐ भी हरीश रावत के पास भाजपा के खिलाफ मुद्दे है और भाजपा विपक्ष होने के बावजूद राज्य के चुनाव में पूरी तरह प्रधानमंत्री के भरोसे है। हरीश रावत इस तथ्य से भली-भांति अवगत है कि मोदी के आभामण्डल को तोड़ने के लिये उन्हें न सिर्फ केन्द्र सरकार की नाकामियों की ओर इशारा करना है बल्कि राज्य सरकार को हो रही आर्थिक दिक्कतों का जिक्र करते हुऐ इस सब का ठीकरा केन्द्रीय सहायता को रोके जाने व सरकार गिराने की साजिश के दौरान की गयी राज्य सरकार की आर्थिक नाकेबंदी के सर फोड़ना है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि केन्द्र सरकार द्वारा योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन करने के चलते उत्तराखंड में आर्थिक तंगी के हालात है तथा सरकारी व्यय का भुगतान करने के लिऐ जिम्मेदार प्रदेश के कोषागार ने विगत् वित्तीय वर्ष से ही कई भुगतानों पर अघोषित रोक लगा रखी है लेकिन चुनावी वर्ष होने के कारण राज्य सरकार ने घोषणाओं व शिलान्यासों की जो झड़ी लगायी है उसे पूरा करने के लिऐ वर्तमान में तथा आगामी वित्तीय वर्ष में भी सरकार को केन्द्रीय सहायता की दरकार है। राजनीति से प्रेरित होने के बावजूद हरीश रावत द्वारा केन्द्र सरकार के खिलाफ दिल्ली में दिया गया यह धरना गलत नही प्रतीत होता क्योंकि केन्द्र सरकार शीघ्र ही अपना बजट पेश करने वाली है और एक राज्य के मुखिया के तौर पर हरीश रावत इस बजट में राज्य के लिऐ कुछ स्पष्ट प्रावधान चाहते है। हांलाकि रावत सरकार पर शराब लाॅबी के लिऐ काम करने अथवा खनन व अन्य अनैतिक धंधों पर जोर देने के आरोप लगाये जाते रहे है और रावत सरकार को निशाने पर लेने के लिऐ विपक्ष उनकी दबंग छवि को भी प्रमुख मुद्दा बनाता रहा है लेकिन अगर प्रदेश सरकार की आय के प्रमुख श्रोतों पर नजर डाले तो हम पाते है कि सीमित संसाधनों वाले इस प्रदेश में सरकार के पास आय के कोई विशेष संसाधन नहीं है और जो संसाधन है भी तो उनपर केन्द्र सरकार के पास आय के कोई विशेष संसाधन नही है और जो संसाधन है भी तो उनपर केन्द्र सरकार ने एजीटी जैसी तमाम ऐजेन्सियों के माध्यम से नकेल डाली हुई है। इन हालातों में अगर प्रदेश सरकार का मुखिया केन्द्र से यह कहता है कि आपने हमारे विद्युत उत्पादन, खनिजों के खनन व प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है तथा आपके द्वारा प्रकृति के संरक्षण हेतु लागू किये गये नियम कानूनों के चलते हमारे प्रदेश में होने वाले विकास कार्याें की लागत बढ़ रही है। इसलिऐं आप हमें व हमारें प्रदेश को मुआवजे के तौर पर विकास कार्यों के लिऐ कुछ अलग धनराशि दीजिये और आगामी बजट में ऐसे प्रावधान भी कीजिये कि यह विकास सतत् रूप से चलता रहे, तो इसमें गलत क्या है? हो सकता है कि कुछ लोगों की नजर में इस धरने का वक्त गलत हो और उन्हें यह धरना सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का एक शगूफा मात्र लगता हो लेकिन यह भी तो माना जा सकता है कि एक सरकार का मुखिया अपने कार्यकाल के लगभग अन्तिम दौर में अपने सम्मुख आयी परेशानियों से रूबरू होने से आगे आने वाली सरकारों को बचाना चाहता हो और उसने यह कोशिश ठीक ऐसे वक्त पर शुरू की हो कि उसपर अपनी खामियों को छुपाने के लिऐ लड़ाई लड़ने का आरोंप ही न लगाया जा सके। वैसे भी अगर देखा जाय तो मोदी सरकार द्वारा बजटीय मामलों को लेकर किये गये फेरबदल के बाद पिछले वित्तीय वर्ष में भाजपा के नेताओं व केन्द्र सरकार ने हरीश रावत को इस काबिल ही नहीं छोड़ा था कि वह अपने राज्य के साथ हुऐ अन्याय की बात सार्वजनिक रूप से कह सकते और अब इस चुनावी बेला में उन्होंने जो कदम उठाया है, उसे अगर सिर्फ राजनीति के चश्में से देखा जायेगा तो आगे आने वाली सरकारों की परेशानी बढ़ सकती है। इसलिऐ राज्यहित में हम सभी लोगों ने हरीश रावत द्वारा केन्द्र सरकार के खिलाफ दिये गये इस सांकेतिक धरने का समर्थन करना चाहिऐं और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर व केन्द्र सरकार की शह पर उत्तराखंड राज्य से किये जा रहे भेदभाव के एवज में प्रर्याप्त आर्थिक मुआवजे की माॅग केन्द्र सरकार से करनी चाहिए। हो सकता हैं कि अपने इस कदम के माध्यम से हरीश रावत अपने व अपने राजनैतिक सहयोगियों के कुछ हित भी साधना चाहते हो और चुनावी मौसम में इको सेन्सेटिव जोन के मुद्दे पर केन्द्र सरकार को निशाने पर लेने की वजह भी पूरी तरह राजनैतिक ही हो लेकिन समय को देखते हुए धरने के विषयों को प्रासंगिक व लोकहितकारी माना जा सकता हैं और प्रदेश भाजपा के नेताओं से भी यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि इन तमाम विषयों पर वह अपना व अपनी पार्टी का रूख स्पष्ट करें। हांलाकि पिछले ढाई-तीन साल से केन्द्र की सत्ता पर काबिज मोदी सरकार की कथनी व करनी का फर्क उनकी नीतियों व फैसलों में साफ दिखता हैं और पहाड़ का सीना चीरकर निकलने वाली गंगा समेत तमाम नदियों के जल को इस्तेमाल करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा बनायी जा रही नीतियों व गंगाजल को पोस्टआॅफिस या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के माध्यम से बेचने के संदर्भ में केन्द्र सरकार द्वारा लिए गये एकतरफा फैसले के बाद यह भी साफ हो जाता हैं कि भाजपा के लोग पहाड़ के प्राकृतिक संसाधनो का प्रयोग बिना इस क्षेत्रवासियों को कोई मुआवजा दिये करना चाहते हैं। इन हालातों में यह एक बड़ा सवाल है कि हमें अपने ही घर से बेदखल करने वाले इस सरकारी फैसले के विरोध का हक क्या सिर्फ इसलिए नहीं होना चाहिए क्योंकि राज्य की विधानसभा के चुनाव सर पर हैं और इस तरह के फैसलों को लागू करने के लिए जिम्मेदार सरकार चलाने वाला दल हमारे राज्य में प्रमुख विपक्षी दल की भूमिका निभा रहा हैं। यह तमाम सवाल बड़े अहम् हैं और भागीरथी घाटी को इको सेसिंटिव जोन घोषित किये जाने के बाद स्थानीय जनता व इसके नेतृत्व का इसके विरोध में आना एक सामान्य घटनाक्रम माना जा सकता हैं, तथा इस विरोध प्रदर्शन के लिऐ दिल्ली को चुने जाने के पीछे सबसे अहम् वजह यह हैं कि राज्य में लग चुकी आचार संहिता के बाद कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करना पहाड़ के नेताओं को पंसद नहीं हैं।

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