Saturday, March 25, 2017

Select your Top Menu from wp menus
Breaking News
  • सभी देश वासियो को जोखिम न्यूज़ की तरफ से गड्तंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये - आपका संजीव पन्त

नये दौर की राजनीति

उत्तर प्रदेश की सपा में दोफाड़ की आंशका निर्मूल और मजबूत हुऐ अखिलेश।
समाजवादी पार्टी के अन्दरूनी झगड़ों के बीच से अखिलेश यादव एक बार फिर मजबूत होकर उभरे है ओर निष्कासन व शक्ति परिक्षण के दौर के बाद अब यह तय हो गया है कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी अखिलेश यादव के नेतृत्व में ही चुनाव मैदान में उतरेगी। हांलाकि अभी यह कहना मुश्किल है कि उत्तर प्रदेश में अखिलेश दोबारा सरकार बनाने में कामयाब होंगे और सत्ता पक्ष के घर में पड़ी फूट का फायदा उठाते हुऐ चुनावी जीत का मंसूबा पाल रही भाजपा या फिर जातीय लामबंदी के भरोसे सत्ता में वापसी की राह देख रही मायावती को एक फिर विपक्ष में बैठना होगा लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि टिकट बंटवारे पर सपा सुप्रीमों के खिलाफ हुई इस बगावत के बाद अखिलेश की जनस्वीकार्यता और ज्यादा बढ़ी है तथा जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि अखिलेश के कुशल नेतृत्व में सपा, यादव सेना अथवा गुण्डों की फौज नजर आने की जगह विकास को तत्पर राजनैतिक दल नजर आ रही है। हम यह तो नहीं कह सकते कि टिकट बंटवारें को लेकर चचा और भतीजे के बीच शुरू हुई वर्चस्व की इस लड़ाई में एकाएक ही यह क्लाईमैक्स कैसे आया तथा अखिलेश व रामगोपाल यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा चुके सपा सुप्रीमों मुलायम सिंह एकाएक ही इतना कैसे बदले कि सबकुछ एक बार फिर अखिलेश के ही हाथ में आ गया लेकिन इतना तय है कि सपा की राजनीति में आये इस परिवर्तन का सत्तापक्ष को फायदा जरूर मिलेगा तथा सपा के नेताओं की गुण्डागर्दी से त्रस्त मतदाता को एकबार फिर अखिलेश यादव पर दांव खेलने से कोई परहेज नहीं होगा। यह ठीक है कि मुलायम सिंह के पारिवारिक झगड़े और विरासत पर कब्जेदारी की जंग अभी खत्म नहीं मानी जा सकती और न ही यह विश्वास किया जा सकता है कि सपा को खड़ा करने में अहम् भूमिका निभाने वाले शिवपाल यादव इतनी आसानी से हार मान लेंगे लेकिन सत्तापक्ष के विधायकों व कार्यकर्ताओं के रूख को देखते हुऐ हाल-फिलहाल के लिऐ अखिलेश को अपना नेता मानना शिवपाल की भी मजबूरी होगी और इस विधानसभा चुनावों के बाद इतना कुछ बदल जायेगा कि शिवपाल चाहकर भी विशेष नहीं कर पायेंगे। अस्सी वर्ष के हो चुके मुलायम सिंह यह समझ चुके है कि उनकी बढ़ती उम्र के साथ ही साथ तेजी से बदले देश के राजनैतिक माहौल ने राजनीति के तौर-तरीके बदल दिये है और इस बदले हुऐ दौर में उनकी या शिवपाल यादव की बूढ़ी हड्डियों मे इतनी ताकत भी नहीं बची है कि वह एक बार फिर सड़कों पर संघर्ष कर संगठन में जान फूंक सके। हो सकता है कि अखिलेश के अलावा उनके अन्य वारिस सत्ता के शीर्ष पदों पर कब्जेदारी के लिऐ बैचेंन हो या फिर चाचा शिवपाल खुद को मुलायम की इस सल्तनत का अगला वारिस मानते हुऐ मुख्यमंत्री बनने के ख्वाब संजों रहे हो लेकिन इस बीच अखिलेश से जो कछ भी हासिल किया है उससे बाजी इन तमाम दावेदारों के ही नहीं बल्कि खुद मुलायम सिंह के हाथों से भी निकल गयी प्रतीत होती है और शायद मुलायम सिंह को भी इसका अंदाजा आ गया है। इसलिऐं उन्होंने जंग का ऐलान करने की जगह समझदारी से काम लिया है और खुद आगे बढ़कर संगठन की कमान अखिलेश के हाथों में देते हुऐ वह बिना कुछ कहें ही बहुत कुछ कह चुके है। अखिलेश ने भी समझदारी का परिचय देते हुऐ बड़बोलेपन या दम्भ को छोड़कर कार्यकर्ताओं की संवेदनाओं को टटोलना शुरू कर दिया है और एक बार फिर यूपी जीतकर नेताजी के कदमों में डाल देने के आवहन के साथ चुनावी लामबंदी का खेल शुरू हो गया है। हांलाकि अखिलेश यादव द्वारा खुद को सपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित करने के अलावा समर्पित कार्यकर्ता राम नरेश उत्तम को उ.प्र. सपा का अध्यक्ष बनाया है तथा अमर सिंह को सपा से निष्कासित करते हुऐ समाजवादी पार्टी के तमाम कार्यालयों पर कब्जा कर सपा के चुनाव चिन्ह पर भी दावा ठोका गया है लेकिन यह तो वक्त ही बतायेगा कि चुनाव आयोग के फैसले के बाद अखिलेश सपा की साईकिल के सवार बन भी पाते है या नहीं और सपा में हुऐ इस परिवर्तन व कार्यकर्ताओं के रूख से भौचक हुऐ शिवपाल अपना पक्ष रखने आयोग की ओर रूख करते भी है या नहीं। खैर अब आगे राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा यह तो पता नहीं लेकिन इस तमाम घटनाक्रम के बाद अखिलेश न सिर्फ सपा के सर्वाेच्च नेता है बल्कि उत्तर प्रदेश के चुनावी दंगल में भी वह एक ऐसे योद्धा बनकर उभरे है जो समाजवादी पार्टी को गुण्डाराज से हटाकर विकास की राह पर ले जाने का प्रयास कर रहे है और इस प्रयास में न सिर्फ उनकी छवि निखरी है बल्कि इस चुनावी मौसम में मीडिया का पूरा ध्यान ही उनपर केन्द्रित हो गया है। अखिलेश को कमतर आंककर उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग में पूर्ण बहुमत पाने का दावा कर रही भाजपा के लिऐ यह एक बड़ा झटका हो सकता है कि सपा में हुई अन्दरूनी खींचतान के बावजूद जनता के बीच अखिलेश की स्वीकार्यता बढ़ी है और जैसी कि राजनैतिक चर्चाऐं चल रही है उसी के अनुरूप उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का चुनाव से पूर्व गठबंधन हो जाता है तो प्रदेश की राजनीति में भाजपा के तीसरे नंबर पर धकेले जाने में किसी को कोई आश्चर्य होगा। हो सकता है कि आगे आने वाले दिनों में समाजवादी कुनबे के बीच कुछ और उठापटक दिखायी दे तथा अखिलेश की इस पहल के बाद खुद को मुलायम की राजनैतिक विरासत का वारिस मानने वाले उनके नजदीकी, समाजवादी पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत करने की अन्तिम कोशिश के तौर पर अखिलेश यादव पर एक बड़ा राजनैतिक हमला करने का प्रयास करें लेकिन हालात बता रहे है कि अब स्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं आने वाला और न ही खुद नेताजी में भी इतनी ताकत बची है कि वह अखिलेश के खेमें में जा चुके पार्टी के नेताओं और विधायकों को उसकी सहमति के बिना अपने पक्ष में खड़ा कर सके। वैसे भी राजनैतिक विरासतों की जंग ताकत से नहीं बल्कि जनसमर्थन व आत्मविश्वास से जीती जाती है और यह स्पष्ट दिख रहा है कि आत्मविश्वास से लबलेज अखिलेश यादव ने इन पिछले पाँच वर्षों में अपने समर्थकों व हितेषियों का एक बड़ा जमावड़ा खड़ा कर लिया है। हम यह तो नहीं कहते कि मौजूदा दौर में अखिलेश उत्तर प्रदेश के एकमेव व एकछत्र नेता है और आगामी विधानसभा चुनावों में कोई नेता उनके समकक्ष टिकता नहीं दिख रहा लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि समाजवादी पार्टी के शीर्ष पदों पर कब्जेदारी से पहले अखिलेश ने आहिस्ता से आम आदमी की नब्ज को टटोल लिया है जिस कारण उन्हें अपने पिता के खिलाफ की गयी इस बगावत के बावजूद जन सामान्य का सहयोग मिलने की पूरी संभावना है और उ.प्र. के राजनैतिक माहौल में चल रही चर्चाओं के अनुरूप अगर कांग्रेस का साथ अखिलेश को मिल जाता है तो यह माना जा सकता है कि उत्तर प्रदेश ने नये दौर की राजनीति का ऐलान कर दिया है।

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *