Saturday, March 25, 2017

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शह और मात के खेल में

चंद स्वार्थी तत्वों की मनमानी का शिकार है देहरादून का प्रेस क्लब ।
एक लिमिटेड कम्पनी में तब्दील हो चुके उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के पे्रस क्लब में पिछले कुछ समय से जो कुछ भी चल रहा है वह वाकई में शर्मनाक है क्योंकि लोकतन्त्र का चैथा स्तम्भ माने जाने वाले मीडिया का झगड़ा सड़क पर आने और इसमें सरकारी हस्तक्षेप व पुलिस द्वारा लाठी भांजने की कार्यवाही के बाद अब आगे जो कुछ भी होगा उसमें सिवाय छिछालेदार के और कुछ भी होने की सम्भावना नहीं है। हांलाकि प्रेस क्लब पर जबरिया काबिज एक गुट ने कमरा बन्द कर चुनावी कार्यवाही की खानापूर्ति कर एक बार फिर सबकुछ अपने नियन्त्रण में लेने के प्रयास शुरू कर दिये है तथा प्रेस क्लब के खाते में गड़बड़ी व सम्पत्ति पर कब्जेदारी की कोशिशों को लेकर समय-समय पर आती रही खबरों के बीच यह सन्देश देेने की कोशिश शुरू हो गयी है कि अब सबकुछ ठीक ठाक है तथा निबन्धक चिट-फंड सोसाइटी की मौजूदगी में हुऐ इस चुनाव के बाद तमाम विवाद निपटा लिये जायेंगे लेकिन क्या वाकई बात सिर्फ यहीं तक सीमित है और प्रेस क्लब के बाहर प्रदर्शन कर रहे पत्रकारों के साथ की गयी पुलिसिया जोरजबरदस्ती वाकई में कानून को कायम रखने की एक कोशिश भर थी। अगर सही मायने में देखा जाय तो ऐसा नही है और इस समुचे घटनाक्रम का गम्भीरता से अध्ययन करने पर यह आभास भी होता है कि स्थानीय प्रशासन व पत्रकारों से जुड़ा मूल विभाग सूचना एवं लोकसम्पर्क भी यह नहीं चाहता कि प्रदेश की राजधानी देहरादून में कलम नवीसों की आवाज उठाने वाला कोई भी संगठन मजबूत हो। शायद यही वजह है कि तमाम पत्रकारों को एक मंच पर लाने का काम करने वाले प्रेस क्लब के चुनाव, सदस्य संख्या अथवा अन्य कार्यवाहियों को लेकर तरह-तरह के अंड़गे खड़े किये जा रहे है और इस सर्वमान्य संस्था को विवादित बनाने की कोशिश की जा रही है। हांलाकि इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि राजधानी बनने के बाद दून में पत्रकारों व समाचार पत्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है और सरकार ने भी इस इजाफे को स्वीकारते हुऐ थोक भाव से मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची जारी की है लेकिन इन तमाम तथाकथित पत्रकारों की वाजिब मांगों, जरूरतों व सरकार द्वारा पत्रकारों के संदर्भ में दी जाने वाली सुविधाओं को लेकर शासन एवं पत्रकार के बीच कड़ी का काम करने वाली एकमात्र वाजिब संस्था प्रेस क्लब इन तमाम पत्रकारों को अपना हिस्सा नहीं मानती और न ही अपनी किसी गतिविधि अथवा कार्यवाही के संदर्भ में इन्हें सूचित करना ही जरूरी समझती है। नतीजतन पत्रकारों के हितों के लिये संघर्ष करने के दावे के साथ कई छोटे-बड़े संगठन सूचना विभाग के साथ मिली भगत कर अपनी दुकान चला रहे है और एक सामान्य पत्रकार के हितों पर डाका डालने का खेल प्रशासनिक मूक सहमति के साथ वर्षो से खेला जा रहा है। होना तो यह चाहिऐ था कि शासन एवं सत्ता स्तर पर पत्रकारों से किये जाने वाले भेदभाव व पत्रकार बन्धुओं को वरीष्ठता के आधार पर दी जाने वाली सुविधाओं हेतु आवाज उठाने के लिये प्रेस क्लब के सम्मानित पदाधिकारियों व वरीष्ठ साथियों ने स्वयं आगे आना चाहिऐं था लेकिन पत्रकार बन्धुओ के र्दुभाग्य से प्रेस क्लब के अहम् पदो पर काबिज हमारे सिपाहसलाहारो ने पत्रकारों का मसीहा बनने के स्थान पर खुद को माफिया समझने वाले चन्द बड़े मीडिया घरानों का चारणदास बनाये रखना ज्यादा जरूरी समझा और प्रेस क्लब के माध्यम से सामान्य पत्रकारों के हितो की लड़ाईयाँ लड़ी जाने के स्थान पर आपसी अहम् व निजी वर्चस्व की लड़ाईयाँ लड़ी जाने लगी। परिणाम स्वरूप राज्य निर्माण के बाद राजधानी के प्रेस क्लब ने ठीक तरीके से अपना काम करना शुरू भी नहीं किया था कि प्रेस क्लब में सरकारी ताले लगा दिये गये और एक ऐसी संस्था जो पत्रकार वर्ग की बड़ी पैरोकार व हितैषी साबित होनी चाहिऐ थी गुमनामी के अन्धेरों में डूब गयी। कुछ जागरूक साथियों ने इस संघर्ष को आगे बढ़ाते हुऐ प्रेस क्लब पर लगे ताले खुलवाने के लिऐ लम्बी कानूनी लड़ाई भी लड़ने की कोशिश की लेकिन प्रशासन ने यह कभी नहीं चाहा कि पत्रकारों के हितों की बात करने वाली यह वाजिब संस्था अस्तित्व में आये । इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि संघर्ष, सत्ता और समर्पण जैसे भावो का सम्पूर्ण ज्ञान रखने वाले राजनीति के चतुर चितेरे हरीश रावत ने पत्रकारों की भावनाओं को समझा और उनके निजी हस्तक्षेप के बाद ही प्रेस क्लब पर वर्षो से पड़ा सरकारी ताला एक बार फिर खोल दिया गया। सदस्यता के आवहन ने नये व युवा पत्रकारों में जोश भरा और प्रेस क्लब का कैम्पस फिर गुलजार दिखायी देने लगा लेकिन खुद को मीडिया जगत का बेताज बादशाह कहने वाले चन्द बड़े मठाधीशों को यह मंजूर नहीं था कि अखबार के नाम पर जोड़-जुगाड़ कर कुछ हकीकत व कुछ किस्से-कहानियाँ आम जनता के बीच पहुँचाने वाले खबरनवीस एक झण्डे के नीचे इकट्ठा हो अपने हको व जरूरतों की बात करें। वैसे भी खुद को बड़ा कहने वाला मीडिया का एक हिस्सा खबरों को अपनी सहूलियत व जरूरत के हिसाब से दबाने, छापने या फिर कत्ल कर देने में मिली महारत के कारण यह नहीं चाहता कि समाचारों के इस धन्धे में ज्यादा लोगों की आमद हो और मजे की बात इसकी वजह, समाचार पत्र की बिक्री प्रभावित होने की सम्भावना अथवा विज्ञापन बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ना नहीं बल्कि खबरों का सच बाहर आने का डर है। डर के इसी खेल ने कुछ लोगों को मजबूर किया हुआ है कि वह येन-केन-प्रकारेण प्रेस क्लब पर अपना वैधानिक अथवा अवैधानिक कब्जा बनाये रखे और अपने छिपे हुऐ उद्देश्यों को पूरा करने के लिये गुमनाम मददगारों की तलाश में रहने वाला प्रशासन इन लोगों को मनमानी करने की पूरी छूट दे रहा है क्योंकि सबके अपने-अपने स्वार्थ व अपनी मजबूरियाँ है।

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