Saturday, March 25, 2017

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लूट की खुली छूट

लोकसंस्कृति एवं पयर्टन को बढ़ावा देने के नाम पर आयोजित कार्नीवाल महोत्सवों में हो रही है सरकारी धन की बन्दरबांट
सांस्कृतिक संर्वधन एवं संरक्षण के मद्देनजर महोत्सवों का आयोजन किया जाना कितना जरूरी व तर्कसंगत है यह तो पता नही लेकिन यह तय है कि अगर इन महोत्सवों में चुनावी अपेक्षाएं मिल जायें तो कलाकार लोक संस्कृति एंव कला का प्रतिनिधि लगने के स्थान पर नेताओं के लिऐ भीड़ जुटाने वाला चेहरा मात्र बनकर रह जाता है और उसकी हर कोशिश से राजनैतिक पुट झलकने लगता है। यूं तो उत्तराखंड में होने वाले तमाम तरह के सांस्कृतिक आयोजनों में सरकारी योगदान के नाम पर दिया जाने वाला अर्थिक अनुदान अथवा कलाकारों के दल को प्रस्तुति के आधार पर किया जाने वाला भुगतान, सरकार की तुष्टीकरण की नीतियों का ही नतीजा है और यह कहने में भी कोई हर्ज नहीं दिखाई देता कि सरकारी निर्देशों के नाम पर की जाने वाली नेताओं की जीहजूरी ने प्रदेश में संस्कृति विभाग के गठन के उद्देश्यों को ही बदल कर रख दिया है लेकिन इस सबके बावजूद विभिन्न राष्ट्रीय एवं वैश्विक मंचों पर उत्तराखंड को विशेष पहचान देने के लिऐ संस्कृति विभाग द्वारा अनावरत् रूप से दिये जा रहे योगदान को नकारा नहीं जा सकता और न ही उन अधिकारियों व कला प्रेमियों को अनदेखा किया जा सकता है जो राजनैतिक हस्तक्षेप की प्रबल संभावनाओं के बाद भी कुछ न कुछ नया देने के लिये प्रयासरत् है। उत्तराखंड के सामाजिक व सांस्कृतिक परिपेक्ष्य में यह माना जाता रहा है कि लोककला व लोकसंस्कृति के धनी इस प्रदेश में स्वतः स्फूर्त आधार पर लगने वाले विभिन्न पौराणिक मेले, तीर्थयात्रियों व पर्यटको के आकृर्षण को केन्द्र रहे है तथा देवी-देवताओं के आवहन के साथ गाये जाने वाले लोकगीतों व लोकनृत्यांे के माध्यम से स्थानीय जनता को एक स्वस्थ मनोरंजन के साथ ही साथ भाईचारे, सामाजिक प्रेम व व्यवहारिकता का अहसास भी कराया जाता है लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों में मंचीय आयोजन में तब्दील हो गयी हमारी लोककला व लोक संस्कृति ने सामाजिक एकता व भाईचारे का संदेश देने के स्थान पर राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन व प्रतिद्वन्दिता का रूप लेना शुरू कर दिया है और विभिन्न सामाजिक अवसर व तीज-त्योंहारों पर होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों का आयोजक बनने के लिऐ मची होड़ को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि मानो अपने क्षेत्र के विकास अथवा संस्कृति के संरक्षण को लेकर प्रयत्नशील होने के अलावा हमारें अन्य कई छुपे हुऐ उद्देश्य भी है। यह ठीक है कि सामाजिक आयोजनों के बहाने जनता में पैठ बनाने की कोशिश तथा इस तरह के आयोजनों में बढ़चढ़कर भागीदारी करने के लिऐ सरकारी तंत्र का प्रयोग गलत नही है और न ही यह उम्मीद ही की जा सकती है कि बिना किसी आर्थिक अथवा सामाजिक लाभ के समर्पित कार्यकर्ताओं की टोली इस तरह के आयोजनों हेतु सुलभ हो सकती हे लेकिन सवाल यह है कि बिना किसी कारण अथवा उद्देश्य के यत्र-तत्र और सर्वत्र आयोजित किये जाने वाले इस तरह के महोत्सवों अथवा कार्नीवालों का जनसामान्य को फायदा ही क्या है। कुछ जागरूक साथी मानते है कि इस तरह के आयोजनों से जहाँ नवोदित कलाकारों को एक मंच मिलता है वहीं स्थानीय स्तर पर पर्यटन को बढ़ावा देने व नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति व लोककलाओं से रूबरू कराने के लिऐ इस तरह के आयोजन अच्छा माध्यम बन सकते है लेकिन यह तमाम संभावनाएं तभी समाप्त हो जाती है जब इस तरह के आयोजनों का सरकारीकरण करते हुऐ इस तरह के मंचों पर कुछ नामी-गिरामी कलाकारों को आमंत्रित करने अथवा सरकारी सहयोग से सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रदर्शन करने की कोशिशें शुरू हो जाती है। यह ठीक है कि लोककला अथवा लोक संस्कृति के लिऐ काम कर रहे कलाकारों को रोजगार दिया जाना तथा उन्हें एक सम्मानजनक मानदेय देने के लिऐ सांस्कृतिक आयोजनों का किया जाना जरूरी है लेकिन अगर इन कोशिशों के तहत सिर्फ भीड़ जुटाने वाले मंचीय आयोजनों के स्थान पर कार्यशालाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों व सूदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतः स्फूर्त अंदाज में होने वाले आयोजनों पर ध्यान केन्द्रित किया जाय तो ज्यादा बेहतर नतीजे निकलकर सामने आ सकते है। हांलाकि कुछ साधन सम्पन्न लोगों का मानना है कि सुविख्यात स्थानों व बड़े मंचों पर किये गये इस तरह के आयोजन स्थानीय कला एवं संस्कृति को एक पहचान देते है तथा इस तरह के आयोजनों के माध्यम से उद्योग-व्यापार व पर्यटन व्यवसाय को भी फायदा मिलता है लेकिन उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में यह तमाम तथ्य सटीक साबित नहीं होते क्योंकि अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि पिछले सोलह वर्षों में राज्य सरकार के सहयोग व अनुदान से लखनऊ, दिल्ली व मुम्बई जैसे महानगरों में अनेकानेक कार्यक्रमों का आयोजन करने के बावजूद भी इन तमाम क्षेत्रों में राज्य को कोई लाभ नहीं दिखता है। हो सकता है कि इस तरह के आयोजनों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर एक क्षेत्र विशेष की जनता को जोड़े रखने अथवा उसे एक राजनैतिक व सामाजिक पहचान देने में मदद मिलती हो और इन आयोजनों को आधार बनाते हुऐ कुछ लोग अपनी मजबूत राजनैतिक जमीन तलाश एक मुकाम हासिल करने में भी कामयाब हो जाते हो लेकिन एक आम आदमी के नजरियें से देखा जाय तो उसे इसमें मनोरंजन की सिवाय और कुछ हासिल नहीं होता। सवाल यह है कि सरकारी पैसे के दम पर होने वाले इस मनोरंजन व चुनावी प्रचार से लोक-कला, लोक-संस्कृति अथवा स्थानीय कलाकारों को क्या लाभ हो सकता है। यह ठीक है की इस तरह के कार्यक्रमों में भागीदारी पर कलाकारों को मानदेय प्राप्त होता है और स्थानीय कलाकारों को मंच मिलने से लोककलाओं के प्रचार-प्रसार की संभावना भी बढ़ती है लेकिन इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस तरह के मंचीय प्रदर्शन पर ज्यादा जोर दिये जाने व पहाड़ों में हो रहे पलायन के चलते हमारी लोक कलाऐं व लोक संस्कृति तेजी से विलुप्त हो रही है। क्या यह अच्छा नहीं होता कि हमारा सरकारी तंत्र प्रादेशिक स्तर पर कार्नीवाल व बड़े महोत्सवों के आयोजन में सहयोग करने के स्थान पर ग्रामीण स्तर पर होने वाले छोटे-छोटे आयोजनों व धार्मिक अवसरो पर लगने वाले मेलों को अपनी प्राथमिकता में रखता तथा आर्थिक अनुदान व कलाकारों को मानदय देने के स्थान पर ऐसी नीति बनायी जाती कि समस्त क्षेत्रीय जनता इस तरह के आयोजनों में अपनी भागीदारी करती। इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि देवभूमि उत्तराखंड की ग्रामीण परिवेश मे पली-बढ़ी जनता अपने देवी-देवताओं व सांस्कृतिक परम्पराओं पर पूरा विश्वास करती है तथा उसके तमाम सांस्कृतिक आयोजन व लोककलाऐं इन्हीं देवी-देवताओं व परम्पराओं के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देते है। ऐसी हालत में हम अपनी लोककलाओं,परम्परा व संस्कृति को मंचीय आयोजन का विषय वस्तु बनाने के स्थान पर इसे अपने ग्रामीण परिवेश तक ही सीमित रखते तो इस तरह के आयोजनों के माध्यम से न सिर्फ पहाड़ो से पलायन कर चुके अपने ईष्ट-मित्रों को एक बार फिर उत्तराखंड आने के लिऐ न्यौता जा सकता था बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से धर्म, कला व संस्कृति के प्रेमी भी हमारे गांवों की ओर रूख करते दिखायी देते और पर्यटन को प्रदेश की आर्थिकी का एक मजबूत संसाधन बनाने में मदद मिलती लेकिन हमारी संस्कृति सरकारी नौकरशाहों द्वारा ‘लूट की खुली छूट‘ के लिऐ आयोजित किये जाने वाले कार्निवालों व महोेत्सवों का अनुगमन करती दिखाई दे रही है और इसके तमाम तरह के नुकसान धीरे-धीरे कर सामने आयेंगे।

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