Saturday, March 25, 2017

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  • सभी देश वासियो को जोखिम न्यूज़ की तरफ से गड्तंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये - आपका संजीव पन्त

राजनैतिक रस्साकशी के बीच

धार्मिक आस्थाओं व तीज-त्योहारों पर सवाल उठाने की कोशिश जारी।

अपनी तथाकथित राष्ट्रभक्ति, समर्पण की भावना तथा धार्मिक कट्टरता के प्रदर्शन में लेशमात्र की चूक न करने वाली हिन्दुवादी ताकतों ने हाल-फिलहाल में नये साल के जश्न व क्रिसमस के अवसर पर होने वाले हर छोटे-बड़े आयोजन केा अपने निशाने पर ले रखा है। हांलाकि केन्द्रीय सत्ता में भागीदारी के दम्भ व कानूनी औपचारिकता के चलते यह विरोध उग्र नहीं है और न ही किसी सार्वजनिक प्रदर्शन अथवा मांगपत्र के जरिये इस तरह के आयोजनों पर रोक लगाने की मांग की गयी है लेकिन क्रिसमस ट्री के स्थान पर तुलसी पूजन व हिन्दू नववर्ष जैसे जुमलो को सोशल मीडिया के समस्त चितपरिचित माध्यमों में बखूबी इस्तेमाल किया जा रहा है और एक तयशुदा रणनीति के तहत भाजपा व उसका रणनैतिक सहयोगी संघ सामाजिक समरसरसता व आपसी भाईचारे को समाप्त कर अपना वोट बैंक मजबूत करने की जुगत में जुटा है। यह ठीक है कि भारतीय राजनीति में इस तरह की कोशिशें प्रतिबन्धित नहीं है और न ही पूर्ववर्ती सरकारों व अन्य राजनैतिक संगठनों को अपनी चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक व जातिगत् आधार पर लामबन्दी के आरोंप से मुक्त किया जा सकता है लेकिन यह तथ्य भी किसी से छुपा नहीं है कि हिन्दू एकता व धर्म के आधार पर लामबन्दी करने वाले लोग जब भी सत्ता के शीर्ष तक पहुंचे है तो उन्होंने अपने समर्थकों को आश्वासनों के अलावा और कुछ भी नहीं दिया है। इन हालातों में जब कुछ जुनूनी लोग किसी विशेष फिल्म, विशेष त्योहार अथवा विशेष कौम के सामाजिक बहिष्कार की बात करते है तो एक डर सा लगता है और राम मन्दिर निर्माण के नाम पर पैदा किया गया जूनून व कौमी दंगे याद आने लगते है। हांलाकि हम इस तथ्य को नकार नहीं सकते कि देश की युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति, धर्म और खानपान से तेजी से दूर जा रही है तथा सामाजिक आयोजनों में युवा वर्ग द्वारा की जाने वाली भागीदारी व पुराने रीति-रिवाजों पर अमल करना अब बीते दिनों की बात हो गयी है लेकिन इसके लिऐ किसी कौम, समाज के किसी वर्ग अथवा पीढ़ी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता और न ही राजनैतिक लामबन्दी कर युवाओं की जीवन शैली में अमूलचूल परिवर्तन लाया जा सकता है। बात नये साल के अवसर पर होने वाले आयोजन तथा क्रिसमस से शुरू हुई है तो यह कहना अतिशयोक्ति नही होगा कि जब सरकार ने सारा सरकारी कामकाज अंग्रेजी नव वर्ष के हिसाब से व्यवस्थित किया हुआ है तो इस अवसर पर किसी भी तरह के आयोजन का विरोध क्यों और वैसे भी भारतीय नववर्ष के अवसर पर विभिन्न प्रकार के पूजा-पाठ व धार्मिक आयोजनों की परम्परा हिन्दू परिवारों में रही है तथा लकीर पीटने वाले अंदाज में किसी न किसी रूप में इन परम्पराओं का निवर्हन किया भी जा रहा है लेकिन इस प्रकार के तमाम धार्मिक आयोजनों के मौके पर अंग्रेजी पाॅप के साथ नृत्य तो नही हो सकता और न ही हमारी संस्कृति हिन्दू नववर्ष के अवसर पर किये जाने वाले पूजन-भजन के बाद दारू-मुर्गे की खुली दावत करने की इजाजत देती है। ठीक इसी प्रकार क्रिसमस के अवसर पर तुलसी पूजन का नारा देने वाले अतिउत्साही लोग यह भूल जाते है कि हिन्दू धर्म को तुलसी के पौधे की पवित्रता व औषधीय गुणों का आंकलन करने उपरांत ही तुलसी एकादशी पर उसके विशेष पूजन के अलावा उसके रोपण, जलाभिषेक व दीप प्रज्वलन के लिऐ विभिन्न नियम बनाये गये है तथा इन तमाम नियमों को तर्को की कसौटी पर कसे जाने के साथ ही साथ वैज्ञानिकता के दृष्टिकोण से भी परखा जा सकता है। इन हालातों में यह आसानी से समझा जा सकता है कि क्रिसमस के आयातित त्योंहार ही होड़ करने के लिऐ हम अपनी धार्मिक परम्पराओं व तौर-तरीकों को किस तरह के खतरें में डाल रहे है और मजे की बात यह है कि अपनी सत्ता बचाने या उसे कायम रखने के लिऐ इस किस्म के नारे देने वाले नेताओं की यह पीढ़ी या तो खुद उन अंग्रेजनुमा स्कूलों की पढ़ी हुई है जहां क्रिसमस व नये साल के आयोजन जीवन का अहम् हिस्सा है या फिर यह नेता अपनी अगली पीढ़ी को तमाम देशी-विदेशी किन्तु अंग्रेजी कल्चर वाले स्कूलों में पढ़ाने के साथ ही साथ निचले स्तर पर चलने वाले इस पब्लिक स्कूल मार्का शिक्षा के व्यापार में लाभ के भागीदार है। वर्तमान दौर में यह तो संभव नहीं है कि सरकार गुरूकुल मार्का स्कूलों की स्थापना कर आने वाली पीढ़ी को ज्ञान व सांस्कृतिक जानकारी उपलब्ध कराने की कोशिश करें और सरकार में आये बदलाव के साथ ही विचारधारा स्तर पर बदलााव लाने के प्रयास तेज किये जाये लेकिन अगर भाजपा व इसकी रणनैतिक सहयोगी संघ के कार्यकर्ता वाकई में एक सामाजिक बदलाव लाना चाहते है तो उन्हें चाहिऐं कि वह सोशल मीडिया पर इस तरह की आधी-अधूरी लड़ाई लड़कर सामाजिक वैमनस्य बढ़ाने की जगह सरकार पर दबाव डाले कि वह सरकारी नियन्त्रण में आने वाले प्राथमिक व माध्यमिक स्तर के विद्यालयों की हालत में सुधार कर उन्हें इस काबिल बनाये कि देश का मध्यम वर्ग उनपर विश्वास कर सकें। हमें इस सत्य को स्वीकार करना ही होगा कि संघ द्वारा चलाये जाने वाले सरस्वती शिशु मन्दिरों व विद्या मन्दिरों के अलावा देश की शिक्षा व्यवस्था के सुद्रढ़ीकरण में मिशनरी स्कूलों व बनियें की दुकान की तर्ज पर चलने वाले पब्लिक स्कूलों का बड़ा योगदान है लेकिन एक आम विद्यार्थी को शिक्षित करने के अलावा इनके पास और भी कई छुपे हुऐ ऐजेण्डे है। इन हालातों में सरकार को चाहिऐं कि वह अपने संसाधनों से चलने वाली सरकारी शिक्षा व्यवस्था व स्कूलिंग पेटर्न में इस तरह के बदलाव करें कि एक छात्र को अपने आरम्भिक जीवन में ही धर्म, संस्कृति, सामाजिक जरूरतों का अहसास होना शुरू हो जाय लेकिन सवाल यह है कि शिक्षा पर होने वाले व्यय को एक अनावश्यक बोझ मान रही हमारी सरकारें ऐसा कुछ करना भी चाहेंगी। हालातों को देखकर तो ऐसा नहीं लगता और न ही यह अहसास होता है कि संघी अनुशासन में तपे होने का दावा करने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने इस कार्यकाल में ऐसा कुछ करने जा रहे है जिससे देश की जनता का विश्वास सरकारी नियन्त्रण में आने वाली शिक्षा व्यवस्था पर बढ़े। अगर वाकई में ऐसा ही है तो फिर व्यापक जनभावनाओं को भड़काते हुऐ एक छद्म युद्ध घोषित करने के पीछे भाजपा व संघ के रणनीतिकारों का उद्देश्य क्या है? कहीं ऐसा तो नहीं है कि एक बार देश की सत्ता पर काबिज होने के बाद भाजपा और संघ के रणनीतिकार शीर्ष पर अपनी कब्जेदारी बनाये रखने के लिऐ इस तरह का माहौल बनाये रखना चाहते हो कि जनसाधारण का ध्यान महंगाई व अन्य मसलों की ओर न जाय।

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