Saturday, March 25, 2017

Select your Top Menu from wp menus
Breaking News
  • सभी देश वासियो को जोखिम न्यूज़ की तरफ से गड्तंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये - आपका संजीव पन्त

चुनावी मौसम में

भाजपा के नेताओं की अपेक्षाओं के अनुरूप भीड़ जुटने के बावजूद जनभावनाओं पर खरी नही उतरी देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली।

अगर कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और मोदी को सुनने आयी जनता के लिहाज से देखा तो उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आयोजित परिवर्तन महारैली को पूरी तरह सफल कहा जा सकता है लेकिन इस रैली में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी और न ही मोदी के भाषण में ऐसा कोई चमत्कार दिखा जिसके आधार पर यह कहा जा सकें कि जनता से राज्य की सत्ता में परिवर्तन करने की मांग करने वाले भाजपा के नेतृत्व ने इस पर्वतीय प्रदेश के चर्हुमुखी विकास को लेकर कोई कार्ययोजना भी बना रखी है। कोरी जुमलेबाजी और विपक्ष पर आरोंप-प्रत्यारोप के साथ सजे मोदी के इस मंच से राज्य सरकार पर हमलावर होने की कोशिशें तो जरूर हुई लेकिन वर्तमान सरकार के एक बड़े हिस्से के साथ ही साथ सत्ता के भागीदार एक पूर्व मुख्यमंत्री के भी मोदी के मंच में सुशोभित होने के चलते यह हमले असरदार नही लगे और न ही यह लगा कि अन्याय व भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक संघर्ष के भाजपाई नारे में कोई दम है। हांलाकि मोदी जी ने अपने संबोधन में पूर्व सैनिकों, वन रैंक वन पेंशन, पहाड़ में दूर-दराज से लकड़ी इक्कठी करने वाली व चूल्हा जलाकर खाना बनाने वाली महिलाओं का जिक्र किया और खुद को पहाड़ के सूदूरवर्ती क्षेत्रों व स्थानीय समस्याओं का जानकार बताते हुऐ जनसंवेदनाओं को छूने की कोशिश भी की लेकिन पहाड़ के सुदूरवर्ती क्षेत्रों के विकास व तमाम स्थानीय मुद्दों को लेकर वह चुप्पी साधे रहे तथा चार धाम यात्रा मार्ग हेतु ‘आल वेदर रोड‘ का सांकेतिक व चुनावी उद्घाटन करने के बावजूद उन्होंने पहाड़ की लाइफ लाइन माने जाने वाली सड़क को लेकर जन सामान्य को कोई आश्वासन देना तक जरूरी नही समझा। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर अगले दो-चार सालों में आल वेदर रोड़ जैसा कुछ भी अस्तित्व में आता है तो चारधाम यात्रा मार्ग और ज्यादा सुचारू व सुविधाजनक हो सकती है तथा इसका सीधा फायदा चार धाम यात्रा मार्ग के इर्द-गिर्द रहने वाले स्थानीय निवासीय व छोटे व्यवसायियों का भी मिलता है लेकिन सवाल यह है कि क्या सड़क यातायात की समस्या सिर्फ चार-धाम यात्रा मार्ग पर ही है? क्या यह जरूरी नही था कि सड़क के नाम पर राजनीति करने निकले मोदी इस सांकेतिक उद्घाटन में सारे प्रदेश की सड़कों को शामिल करते और आगे आने वाले वर्षों में बनने वाली अथवा मरम्मत की जाने वाली तमाम सड़कों के मामले में उस तकनीक का आजमाया जाता जिससे कि बरसात के मौसम में अधिकांशतः ही बंद रहने वाली पहाड़ की तमाम सड़के ‘आल वेदर रोड‘ हो सकती। यह ठीक है कि चुनाव के इस मौसम में जनसमर्थन हासिल करने के लिऐ थोड़ा झूठ- थोड़ा सच मिलाकर जनता को उद्देलित करने का तरीका भारतीय राजनीति में गलत नहीं माना जाता और न ही भारतीय संविधान ने निरीह मतदाता को ऐसी शक्तियों से नवाजा है कि वह अपना पूर्व में किया गया गलत फैसला वापस ले सकें लेकिन इसका तात्पर्य यह भी तो नही है राजनीति और लफ्फेबाजी के नाम पर अपनी गलतियां छुपाने का आपको लाइसेंस ही मिल गया है। यह माना जा सकता है कि उत्तराखंड राज्य का गठन माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नेतृत्व में चल रही राजग सरकार का फैसला था लेकिन अगर इस एक कथन से उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के लंबे संघर्ष व बलिदान को दरकिनार करने का प्रयास किया जाता है तो इस तरह के कथनों व नारों का विरोध जरूर किया जाना चाहिऐं और इस तथ्य से भी जन-जन को अवगत् करवाना चाहिए कि अस्थायी राजधानी देहरादून का अदूरदर्शी फैसला भाजपा की कुत्सित सोच का ही परिणाम था जिसका खामियाजा वर्तमान तक हर उत्तराखंडी को भुगतना पड़ रहा है। एक पत्रकार, सक्रिय राज्य आंदोलनकारी व उत्तराखंड राज्य का स्थायी बाशिन्दा होने के नाते मैं यह महसूस करता हूँ कि राज्य गठन का दावा करने वाली भाजपा ने अगर पहले मौके का सही इस्तेमाल किया होता तो वर्तमान में इस पहाड़ी प्रदेश के दूरस्थ ग्रामीण अंचल में पलायन, बेरोजगारी और मूलभूत समस्याओं का आभाव जैसी कई समस्यायें नहीं होती। यह ठीक है कि मोदी की इस चुनावी रैली में भारी जन सैलाब व अपने नेता के सुर से सुर मिलाने वाला कार्यकर्ताओं का एक बड़ा जमावड़ा था और यह भी हो सकता है कि भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं की मेहनत व चुनावी गणित के ठीक-ठाक अंदाजे के चलते भाजपा के लोग उत्तराखंड में सरकार बनाने में कामयाब भी हो जाय लेकिन अगर सवाल, सिद्धान्तों, नीतियों अथवा जमीनी सरोकारों का होगा तो इन तमाम परिपेक्ष्यों में भाजपा को पूरी तरह असफल ही माना जायेगा क्योंकि भाजपा के अन्य तमाम बड़े नेताओं की तरह ही देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी यहां आकर इन तमाम विषयों पर अपना स्पष्ट विजन नही रख पाये। प्रधानमंत्री ने अपने मंच से बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रदेश के मुखिया धन विहीन होने के बावजूद जोर-शोर के साथ विभिन्न योजनाओं का शिलान्यास कर घोषणाऐं व लोकार्पण कर रहे है लेकिन वह जनता को यह आश्वासन देने में कंजूसी कर गये कि राज्य में भाजपा की सरकार बनने की स्थिति में वह केन्द्र पोषित योजनाओं के जरिये इन तमाम घोषणाओं व जनहितकारी योजनाओं को पूरा करेंगे और न ही वह इस राजनैतिक मंच से यह कहने की हिम्मत जुटा पाये कि भाजपा इन तमाम शिलान्यासों व घोषणाओं का विरोध करते हुऐ इस घोषणा के साथ इन्हे खारिज करती है कि राज्य में भाजपा की सरकार बनने की स्थिति में इनमें से किसी पर भी कार्य नहीं होगा। राज्य की सामान्य जनता को मोदी के इस दौरे से बहुत उम्मीदे थी और भाजपा के भी स्थानीय नेतृत्व का मानना था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उत्तराखंड के इस प्रथम राजनैतिक दौरे में मोदी जनहितकारी योजनाओं व घोषणाओं के माध्यम से केन्द्र में सरकार बनाने के लिऐ पांच सांसद देने वाली उत्तराखंड की जनता का धन्यवाद अदा करंगे लेकिन मोदी जी अपने भाइयों और बहनों को सिर्फ आश्वासनों व बातों से ही टाल गये। भाजपा को उत्तराखंड की सत्ता पर काबिज करवाने का दम भर रहे संघ के रणनीतिकारों व भाजपा के शीर्ष नेताओं के लिऐ यह हर्ष का विषय हो सकता है कि मोदी की इस जनसभा में परेड ग्राउण्ड ठीक-ठाक तरीके से भरा नजर आया और मौसम की अनुकूलता व लगभग नियत समय पर मोदी के आगमन के चलते उन्हें किसी भी तरह के प्रतिकूल माहौल का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन अगर गौर से देखा जाय तो मोदी की इस रैली में भीड़ के रैले को मोदी का करिश्मा खींचकर नही लाया बल्कि भाजपा से टिकट की दावेदारी करने वाले संभावित प्रत्याशियों की मजबूरी ने इस भीड़ को जुटाने के लिये अपना खून-पसीना एक किया और अब देखना यह है कि विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों से टिकट की दावेदारी कर रहे इन नेताओं को अपनी इन मेहनत का प्रतिफल किस रूप मे मिलता है।

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *