Saturday, March 25, 2017

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  • सभी देश वासियो को जोखिम न्यूज़ की तरफ से गड्तंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये - आपका संजीव पन्त

साधों यह परिवर्तन क्या है

क्या सिर्फ एक लोकलुभावन नारा है भाजपा की परिवर्तन यात्रा।

अपनी विभिन्न मांगो को लेकर हड़ताल के आवहन के साथ सड़कों पर उतरे कर्मचारी संगठनों को आधे-अधूरे समझौतों व घोषणाओं क जरिये हड़ताल की समाप्ति के साथ काम पर वापस भेजने में उत्तराखंड की सरकार लगभग कामयाब दिखती है और संविदा कर्मिकों व उपनल कर्मियों के संदर्भ में लिये गये कई फैसलों के मद्देनजर ऐसा भी प्रतीत होता है कि सरकार को इस सारी जद्दोजहद का बड़ा फायदा मिल सकता है लेकिन सवाल यह है कि इस चुनावी वर्ष की अन्तिम बेला में सरकार द्वारा अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी रोजगार दिये जाने, भांग की खेती व शराब का कारखाना लगाये जाने अथवा खनन व्यवसायियों को अतिरिक्त सुविधाऐं देने से इस प्रदेश की अर्थव्यवस्था को क्या लाभ हो सकता है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि कर्ज से खर्च चला रही उत्तराखंड सरकार के पास आय के संसाधन सीमित है और बेतरतीब बने राज्य सरकार के ढ़ाँचे में अनावश्यक पदोन्नति व सेवानिवृत्त कार्मिकों को पुनः समायोजित किये जाने की परम्परा ने सरकार का खर्च कुछ ज्यादा ही बडा़ दिया है। इन हालातों में सरकार का अपनी आय बढ़ाने के लिऐ आय के स्थापित संसाधनों को दुरूस्त करना तथा नये संसाधनों की तलाश करना वाजिब जान पड़ता है लेकिन सवाल यह है कि क्या पहाड़ में खनन, नशे की सामग्री के उत्पादन व निर्माण तथा कंकरीट के जंगल बसाये जाने के अलावा अन्य कोई रोजगार नही है जिसके माध्यम से सरकार पहाड़ का विकास कर सके। यह ठीक है कि पहाड़ों में तेजी से हुये पलायन के चलते गांव के गांव आबादी विहीन हो गये है और बेहतर सुविधाओं की चाहत ने जन सामान्य के साथ ही साथ सरकारी कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग को भी राज्य के मैदानों जिलों की ओर आकृर्षित किया है लेकिन इसका तात्पर्य यह तो कदापि नही है कि सरकारी तंत्र पहाड़ों पर रहकर अपना जीवन गुजार रहे उस साधनविहीन तबके को भूल जाय जिसने अपनी मेहनत के बल पर पहाड़, आज भी आबाद रखा है। इसी सोच के साथ सरकार शिक्षा के क्षेत्र में गेस्ट टीचर की परिकल्पना प्रस्तुत करती है और विकासखण्ड स्तर पर नितांत रूप से अस्थायी नियुक्ति दिये जाने के आदेशों के साथ शिक्षा विभाग पर एक नया प्रयोग शुरू होता है लेकिन राजनैतिक हस्तक्षेप व महत्वाकांक्षा यहां भी जोर मारने लगती है तथा सर्वजनहिताय की नीयत के साथ लिये गये इस फैसले की परणीति तुरत-फुरत में खड़े हुऐ गेस्ट टीचरों के एक संगठन एवं लंबे आन्दोलन के साथ होती है। हम यह नहीं कहते कि अपनी जायज मांगों के लिऐ संगठन बनाना या फिर हड़ताल करना गलत है लेकिन इस तरह का कोई कदम उठाने से पहले हमें अपनी जिम्मेदारियों का भी एहसास होना जरूरी है। आन्दोलन की बदोलत अस्तित्व में आये इस पहाड़ी राज्य में अपने हकों की लड़ाई के नाम पर होने वाले तमाम आन्दोलनों में इस जिम्मेदारी का अहसास गायब दिखता है और कर्मचारी संगठनों के बीच तो हड़ताल ने एक फैंशन का रूप ले लिया है लेकिन यह एक बड़ा सवाल हो सकता है कि जोड़-जुगाड़ के बलबूते सरकारी कार्यालयों में संविदा, ठेका श्रमिक अथवा तदर्थ रूप से काम करने वाले कर्मकार को स्थायी रूप से रोजगार दिये जाने का हकदार क्यों माना जाना चाहिऐं ? यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि एक आम पहाड़ी आज भी सीधे-सीधे तरीके से नौकरी कर दो वक्त की रोटी जुटाने पर यकीन करता है और उसे सरकारी नौकरी से बड़ी आस होती है लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार अपने अधिकार क्षेत्र में रहने वाले हर युवा को पक्की सरकारी नौकरी दे सकती है, शायद यह संभव नही है। इसीलिऐं सरकार वैकल्पिक व्यवस्थाओं के तौर पर पर्यटन को बढ़ावा देने, उद्योग धंधे लगाने और रोजगार के अन्य संसाधन ढूढ़ने का प्रयास करती है लेकिन कुछ चालाक लोग इन तमाम सरकारी व्यवस्थाओं को धता बताते हुऐ आन्दोलनों के माध्यम से युवाओं के हक पर डाका डालने की कोशिश करते है तथा तथ्यों को कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है कि आम आदमी को इसका सिर्फ काला पक्ष ही नजर आता है। वर्तमान में प्रदेश की पहाड़ी भू-भाग वाली विधानसभाओं में अपना राजनैतिक अस्तित्व तलाश रहे कुछ प्रवासी उत्तराखण्डी पूर्ववर्ती सरकारों के तमाम फैसलों को निशाने पर रखते हुऐ कुछ इसी तरह की कोशिश करते नजर आते है और उनके शब्द वाणों से ऐसा प्रतीत होता है कि मानो पहाड़ कर पीड़ा ही उन्हें अपनी कर्मभूमि से इतनी दूर इस मातृ भूमि की ओर खींच लायी है जबकि हकीकत में ऐसी तमाम हस्तियां हमारी आशाओं व उम्मीदों को हवा देकर अपने स्वार्थ सिद्धि के जुगाड़ में लगी है और हमारी समस्याओं या परेशानियों से उनका कुछ भी लेना देना नही है। पहाड़ो पर सड़कों के किनारें बढ़ती जा रही मस्जिदों व सरकारी इमदाद से खुलने वाले मदरसों पर चिन्ता व्यक्त करते हुऐ दुबले होते दिखते इन तथाकथित नेताओं को यह तो पता ही नही है कि पहाड़ो के ग्रामीण परिवेश में लगातार आयोजित होने वाली रामलीलाओं से लेकर अन्य तमाम सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजनों मे यहां रहने वाले मुसलिम परिवारों की सहर्ष सहभागिता रही है तथा दशकों से पहाड़ों पर रह रहे इन मुसलिमों को उनकी जरूरत के हिसाब से पूजा-अर्चना अथवा शिक्षा व्यवस्था के लिये कुछ स्थान उपलब्ध कराया गया है तो इसके पीछे जोर-जबरदस्ती नही बल्कि आपसी रजामंदी व भाईचारे की व्यवहारिकता ज्यादा है। हांलाकि इस तथ्य को नकारा नही जा सकता कि पहाड़ी समाज की सहदयता का फायदा उठाते हुऐ कुछ आसामाजिक तत्व व अपराधी दुरूह पर्वतीय क्षेत्रों को अपना ठिकाना बन सकते है और धर्म के नाम पर तेजी से बढ़ने वाली इस कौम की तादाद कुछ ही दशकों में पहाड़ियों को दोयम दर्जें का नागरिक बना सकती है लेकिन सामाजिक वैमनस्य उत्पन्न करना इसका बेहतर विकल्प नही माना जा सकता और न ही एक कौम विशेष को ध्यान में रखते हुऐ नियम व कायदें बनाये जा सकते है। उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना में सशक्त पहाड़ी समाज होना आवश्यक है और यह मजबूती तभी मिल सकती है जब हम खुद को अपनी मिट्टी व पैतृकों की भूमि से जुडा़ हुआ महसूस करें लेकिन अफसोस पहाड़ों के सीढ़ीनुमा खेतों पर खेती अब बीते दिनों की बात हो चुकी है और तमाम राजनैतिक व सामाजिक कारण हमें मजबूर करते है कि हम भांग की खेती व पहाड़ी फल उत्पादों से शराब बनाये जाने जैसे विकल्पों का विरोध करें। इन हालातों में पहाड़ों पर तथाकथित विकास के नाम पर सीसी रोड, पानी की टंकी या खंड़जे बनाये जाने का औचित्य ही क्या है और हम किस आधार पर यह दावा कर सकते है कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण इस क्षेत्र के दुर्गम पर्वतीय हिस्से को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ने के लिये किया गया था। यह ठीक है कि राज्य गठन के बाद से वर्तमान तक बनने वाली तमाम जनहितकारी सरकारों ने पहाड़ के गांवों को केन्द्र में रखकर किसी भी योजना का निर्माण नही किया है और न ही खुद को क्षेत्रीय हितों का पेरोकार बताने वाले तमाम जनवादी संगठनों ने यह कोशिश ही की है कि वह सरकार के समक्ष आईना प्रस्तुत करते हुये सुदूरवर्ती दुर्गम क्षेत्र में एक ऐसा आदर्श गांव स्थापित करें जो सरकारी व्यवस्थाओं के मुंह पर एक तमांचे की तरह हो लेकिन इसका तात्पर्य यह भी तो नही है कि इस तरह की कोशिश की ही नही जानी चाहिऐं या फिर इस सोच को राजनैतिक चश्में से ही देखा जाना जरूरी है। गैंरसेण में विधानसभा भवन, भांग की खेती के विकल्प पर विचार, स्थानीय कृषि उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के लिऐ अम्मा भोजनालयों की स्थापना व महिला स्वंय सहायता समूहों को आगे लाने की दिशा में किया जा रहा प्रयास तथा हरेला, झुमैलों, घी-संक्राद जैसे तमाम स्थानीय पर्वों को सरकारी स्तर पर दी जा रही मान्यता प्रदेश की वर्तमान सरकार के कुछ ऐसे ही प्रयास है जिन्हें चाहकर भी झुठलाया नही जा सकता लेकिन उत्तराखंड राज्य निर्माण का दावा करने वाली कुछ राजनैतिक ताकतें उत्तराखंड राज्य आन्दोलनकारियों के संघर्ष को दरकिनार करने के साथ ही साथ मौजूदा सरकार के इन प्रयासों पर भी पानी फेरना चाहती है।

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