Saturday, March 25, 2017

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परिवर्तन की सुगबुगाहट

हरीश रावत सरकार द्वारा खेली गयी धुंआधार पारी के बाद आने वाली सरकारों के लिऐं आसान नहीं होगा जनापेक्षाओं पर नियन्त्रण पाना।

उत्तराखंड का चुनावी घमासान अपने चरम् पर है और अपने तख्तोताज को बचाने के लिऐ संघर्ष कर रहे ‘हरदा‘ ने लालबत्तियों व ओहदों की बंदरबांट का सिलसिला तेज कर दिया है लेकिन राजनीति के गलियारों में मुख्यमंत्री के इस कदम का कोई विरोध नही है क्योंकि सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के ही नेता जानते है कि राजनीति के इस खेल में कार्यकर्ता जुटाना आसान नही रह गया है। इसे जनसामान्य के बीच बढ़ रही राजनैतिक जागरूकता का असर कहें या फिर नेताओं की दिनोंदिन बढ़ रही महत्वाकांक्षाओं का परिणाम लेकिन यह सच है कि हर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा और कांग्रेस से दावेदारों की लंबी सूची के अलावा निर्दलीय रूप से मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे प्रत्याशियों की बड़ी संख्या स्पष्ट नजर आ रही है तथा किसी भी विधान सभा क्षेत्र में यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि यहां अन्तिम मुकाबला राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के प्रत्याशियों के बीच ही होगा। यह ठीक है कि सपा, बसपा, उक्रंद समेत अन्य तमाम क्षेत्रीय गठबंधनों में प्रत्याशियों के चयन को लेकर इस तरह की मारामारी नहीं है और न ही इन दलों के बड़े नेताओं ने आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुऐ वर्तमान तक कोई बड़ा आयोजन ही किया है लेकिन पिछले चुनावों के अनुभव व जनता का रूझान इशारा कर रहा है कि विधानसभा के इस महासंग्राम में स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में सरकार बनाने की कुंजी निर्दलियों व अन्य क्षेत्रीय दलों के हाथ ही रहने वाली है। हांलाकि सत्ता के शीर्ष पर बैठे हरीश रावत दायित्वो व लालबत्तियों की रेवड़िया बांटकर बगावत की तमाम संभावनाओं को न्यूनतम करने का प्रयास कर रहे है और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी अपने कार्यकर्ताओं को अनुशासन का पाठ पढ़ा विद्रोह की संभावनाओं को कम करने का प्रयास कर रहा है लेकिन निर्दलीय जीतने की स्थिति में मिलने वाले ओहदें व मंत्रीपद की संभावनाओं ने बगावती तेवरों के हौसले बुलन्द कर रखे है तथा सत्तापक्ष में हुई बगावत के बाद बागी नेताओं के रूतबे व विपक्ष द्वारा दी गयी टिकट की गांरटी को देखते हुऐ कोई भी नेता अपने हाईकमान के समक्ष झुकने को तैयार नहीं है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सत्तापक्ष तथा विपक्ष अपने ही मकड़जाल में उलझे हुऐ है जबकि किसी भी कीमत पर चुनावी समर में दो-दो हाथ करने को लालायित नेताओं ने अपनी तैयारियाँ शुरू कर दी है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा द्वारा प्रदेश स्तर पर किसी स्थानीय नेता को चुनावी चेहरा न बनाये जाने के कारण पहली नजर में भाजपा कमजोर नजर आती है लेकिन अमित शाह व नरेन्द्र मोदी ने खुद अपनी सभाऐं आयोजित कर इस कमजोरी को मजबूती में बदलने का प्रयास किया है और आचार संहिता से पहले प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में डेरा डालकर बैठे केन्द्र सरकार के विभिन्न मन्त्रियों द्वार की जा रही घोषणाओं व जनसभाओं के माध्यम से हरीश रावत की घेराबंदी के प्रयास तेज कर दिये गये है। भाजपा की संगठनात्मक ताकत माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ ने पूरी सजगता के साथ प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेताओं के अन्र्तविरोध को पाटने का काम तेज कर दिया है तथा सतपाल महाराज को राष्ट्रीय मंचो पर पूरा सम्मान देकर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि भाजपा में बागियों का सम्मान व दावेदारी पूरी तरह सुरक्षित है जबकि इसके ठीक विपरीत कांग्रेस के बड़े नेता कई मुद्दो पर एकमत नहीं दिखाई देते और संगठन व सरकार स्तर पर हुई हालियां बड़ी टूट के बावजूद कांग्रेस के बड़े नेताओं में समन्वय का पूर्णतः आभाव दिखता है। पीडीएफ को सत्ता में भागीदारी देने के बाद इसके तमाम सदस्यों के अगली विधानसभा में पहुंचने की राह आसान करने के मामले में तो सरकार व संगठन का अन्र्तविरोध साफ दिखता है तथा स्थापित नेताओं की अगली पीढ़ी को चुनाव मैदान में उतारे जाने या फिर विपक्ष के बड़े नेताओं का सड़कों पर विरोध करने जैसे कई मुद्दों पर कांग्रेस सरकार व संगठन एकमत नहीं है। शायद यहीं वजह है कि चुनाव सर पर होने के बावजूद कांग्रेस के बड़े नेताओं के बीच रूठने और मनाने का सिलसिला जारी है तथा अपने-अपने समीकरणों व तिकड़मों को सामने रख सौदेबाजी का एक नया खेल शुरू हो गया है। यह ठीक है कि उत्तराखंड के इन विधानसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा की पूरी कमान अमित शाह व नरेन्द्र मोदी के हाथ में तथा कांग्रेेस से सम्बन्धित तमाम फैसलों पर नियन्त्रण घोषित-अघोषित रूप से हरीश रावत के हाथों में दिखता है लेकिन हालातों के मद्देनजर अगर गौर करें तो यह साफ दिखता है कि इन चुनावों के बहाने राज्य की राजनीति नया नेतृत्व तलाशने की कोशिश कर रही है और यह तय माना जाना चाहिऐं कि इस विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा व कांग्रेस में संगठनात्मक स्तर पर तथा सरकार में कार्यशैली के स्तर पर एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है। हांलाकि यह सब लिखने के पीछे हमारा यह आशय कदापि नही है कि इन चुनावों में राज्य में राज्य आंदोलन के दौरान सक्रिय रही आन्दोलनकारी ताकतें कुछ अहम् भूमिका निभायेंगी या फिर हासियें पर पड़े तमाम क्षेत्रीय दल कोई बड़ा चमत्कार करते हुऐ राजनीति की मुख्यधारा में वापसी करेंगे लेकिन प्रदेश की जनता द्वारा नकारे जा चुके सत्ता पक्ष व विपक्ष के तमाम बड़े नेेताओं की उम्र और राजनीति में सीमित भागीदारी को देखते हुऐ इस तथ्य को दावे से कहा जा सकता है कि प्रदेश की राजनीति में जल्द ही एक बड़ा बदलाव आ सकता है। यह ठीक है कि भाजपा की राजनीति पर हावी हाईकमान तथा सत्ता में वापसी के लिऐ आतुर नजर आ रहे हरीश रावत को देखते हुऐ बड़े बदलाव की यह परिकल्पना बेमानी लगती है और ऐसा प्रतीत होता है कि जोड़-जुगाड़ के खेल पर निर्भर उत्तराखंड की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव आना संभव ही नही है लेकिन अगर तथ्यों पर गौर करें तो यह साफ दिखता है कि सरकार बनाने की स्थिति में आते ही भाजपा के बड़े नेताओं का यह पहला प्रयास होगा कि वह राज्य की राजनीति में स्थापित नेताओं को दरकिनार कर एक नये चेहरे को आगे लाये जबकि कांग्रेस की जीत की स्थिति में मुख्यमंत्री पद के सबसे मजबूत दावेदार होने के बावजूद हरीश रावत का शुमार कांग्रेस के बड़े नेताओं मे होगा और इन हालातों में कांग्रेस हाईकमान हरीश रावत का उपयोग आगामी लोकसभा चुनावों में मोदी का विरोध करने वाले बड़े चेंहरे के रूप में करना चाहेगी। इन दोनों ही परिस्थितियों में प्रदेश को नया व अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व मिलना तय है और प्रदेश के विभिन्न् हिस्सों में सुनाई दे रही आंदोलन की सुगबुगाहट व हरीश रावत सरकार द्वारा खेली गयी धुंआधार पारी के चलते स्थानीय स्तर पर लगातार बढ़ रही जनाकांक्षाऐं यह इशारा भी कर रही है कि आने वाली सरकारों के लिऐ आम आदमी के जज्बातों को दरकिनार कर फैसले लेना अब आसान नही होगा।

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